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देश के विभिन्न राज्यों में किसान आंदोलन

Kisan movement: वर्ष 1980 के बाद देश के विभिन्न राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात ,कर्नाटक ,आंध्र प्रदेश ,पंजाब हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में बड़े स्तर पर किसान आंदोलन हुए तथा कुछ नए संगठन अस्तित्व में आए, तमिलनाडु में श्रीनारायणस्वामी नायडू, महाराष्ट्र में शरद जोशी ,पंजाब में भूपेंद्र सिंह मान , कर्नाटक में प्रोफेसर नंजुन्दा स्वामी और एस एच रुद्रप्पा तथा उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में सुसंगठित रूप से किसान आंदोलन हुए जिनमें हिंसा की भी अनेक घटनाएं हुई ! किसानों की प्रमुख मांगों में एक सामान्य मांग खाद्यान्न का लाभकारी मूल्य रहा है जो तमिलनाडु से प्रारंभ होकर देश के अन्य राज्यों में फैल गई !

महाराष्ट्र किसान आंदोलन

साल 1979,80 में महाराष्ट्र में चमत्कारी नेता शरद जोशी का अभ्युदय हुआ, जिनके नेतृत्व में प्याज गन्ना, तंबाकू के मूल्य में वृद्धि करने के लिए किसानों ने राज्य के विभिन्न भागों में आंदोलन किया ! किसान आंदोलन के फलस्वरुप 1980 में महाराष्ट्र सरकार में गन्ने का मूल्य बढ़ाना स्वीकार कर लिया, इस सफलता के कारण शरद जोशी में किसानों का विश्वास और अधिक बढ़ गया! किसान हितों के लिए सुसंगठित रूप से संघर्ष करने के उद्देश्य से 1 जनवरी 1982 को शरद जोशी ने “शेतकारी संगठन” के नाम से एक नए संगठन का निर्माण किया ! शरद जोशी की प्रमुख मांग कृषि को लाभकारी बनाने हेतु खाद्यान्न लाभकारी मूल्य (रिमुनरेटिव प्राइस) निश्चित कराना रहा, साल 1985,87 में शरद जोशी द्वारा किसानों के लिए अनेक हिंसात्मक आंदोलन चलाए गए, जिनके परिणामस्वरुप किसानों की अनेक मांगे पूरी भी हुई !
किसानों की विभिन्न समस्याओं के निदान के लिए कर्नाटक में 1950 से बराबर आंदोलन होते रहे लेकिन 1980 के बाद से इन आंदोलनों का रूप हिंसात्मक हो गया, प्रोफेसर नंजुन्दा स्वामी तथा एस एच रुद्रप्पा के नेतृत्व में किसानों ने सुसंगठित रूप से अपनी मांगों के लिए संघर्ष किया, धारवाड़ जिले में किसानों पर की गई फायरिंग के बाद “रैयत संघ” द्वारा सशक्त किसान आंदोलन शुरू हुए ! रैयत संघ कर्नाटक राज्य में किसानों का सबसे बड़ा संगठन है, 1980 में गुड्डू राव सरकार द्वारा लगाए गए बैटरमेंट लेवी के विरुद्ध तथा पानी और सिंचाई की समस्याओं को लेकर एक आंदोलन प्रारंभ हुआ, अगस्त 1982 में किसानों और पुलिस के बीच टकराव हुआ इसी के साथ गन्ने का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों में किसानों ने गन्ना मूल्य बढ़ाने के लिए आंदोलन किया! 1983 में राज्य में कांग्रेस सरकार के पतन और जनता पार्टी को सत्ता में लाने में रैयत संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की !
जनवरी 1984 में रैयत संघ ने सरकार को एक 19 सूत्रीय मांग पत्र दिया और 26 जनवरी 1984 से रैयत संघ ने पूरे राज्य में “रास्ता रोको” और “रेल रोको” आंदोलन प्रारंभ कर दिया, रैयत संघ ने अपनी 19 मांगों में से सात मांगों को तुरंत स्वीकार किए जाने का आग्रह किया इनमें से कुछ इस प्रकार की मांगें थी किसान आंदोलन में भाग लेने वालों के विरुद्ध फौजदारी के मुकदमों की वापसी, सहकारी तथा अन्य व्यापारिक बैंकों से किसानों द्वारा लिए गए ऋण की माफी, खाद्यान्न का लाभकारी मूल्य निर्धारण इत्यादि, सरकार ने इन मांगों को स्वीकार करने में अपने पूर्ण असमर्थकता व्यक्त की ! इस आंदोलन में लगभग 30000 किसान गिरफ्तार किए गए अंत में 7 दिनों बाद जनमत को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए संघ ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया !

गुजरात किसान आंदोलन

गुजरात में भारतीय किसान संघ ने सितंबर 1986 से किसान आंदोलन उग्र रूप में प्रारंभ किया, निरंतर सूखे के फलस्वरुप किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यधिक खराब हो गई जिसने किसानों को हिंसक बना दिया ! पूरे देश में सबसे ज्यादा बिजली शुल्क गुजरात में दिया जाता है, किसानों की 31 सूत्रीय मांगों में बिजली दर में कमी, खाद्यान्न का लाभकारी मूल्य, सरकारी कर्जों की माफी ऐसी कुछ प्रमुख मांगे थी, सितंबर 1986 से मार्च 1987 तक के बीच किसान संघ ने 17 विराट प्रदर्शन किया तथा रैलियां संगठित की, जनवरी 1987 को बीजापुर में हुई रैली में लगभग चार लाख किसानों ने प्रतिभाग किया, 19 मार्च 1987 को किसानों ने गुजरात विधानसभा का घेराव किया, जिसने हिंसात्मक रूप धारण कर लिया ! किसानों पर पुलिस फायरिंग हुई जिसमें 10 किस मारे गए, 27 मार्च को किसानों ने “रास्ता रोको” ,” रेल रोको” और “जेल भरो” आंदोलन शुरू कर दिया, इस आंदोलन के फलस्वरुप जून 1987 में गुजरात सरकार ने बिजली की दरों में कुछ रियायतें देना स्वीकार किया, किसान आंदोलन का प्रारंभ भारतीय किसान संघ द्वारा किया गया था लेकिन बाद में एक अन्य किसान संगठन समिति इस आंदोलन में शामिल हो गया 1987,88 के बीच संगठन द्वारा अनेक हिंसापूर्ण आंदोलन चलाए गए !

पंजाब किसान आंदोलन

पंजाब में मार्च 1984 में भारतीय किसान यूनियन के नेता भूपेंद्र सिंह मान के नेतृत्व में किसानों ने आंदोलन किया और एक सप्ताह तक चंडीगढ़ में राज भवन का घेराव किया, इस घेराव में 50,000 किसान सम्मिलित थे, आंदोलन का मुख्य मुद्दा खाद्यान्न के लाभकारी मूल्य तथा बिजली की दरों में कमी की मांग थी ! 7 दिनों के इस घेराव के परिणाम स्वरुप सरकार ने किसानों की लगभग सभी मांगों को मान लिया !

उत्तर प्रदेश किसान आंदोलन

उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन के नाम से किसान संगठन का निर्माण चौधरी चरण सिंह द्वारा अगस्त 1979 में किया गया, इसका मुख्य उद्देश्य जाटों को संगठित करना था, किसान यूनियन की स्थापना हरियाणा राज्य के गुड़गांव जिले में हुई थी यूनियन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में ग्राम कान्झावाला (दिल्ली) के उदय सिंह और तारा सिंह थे कान्झावाला में भूमि संबंधित कुछ विवाद था, भारतीय किसान यूनियन ने सबसे पहले इसी मुद्दे को उठाया, दिल्ली, हरियाणा ,मेरठ के हजारों जाटों ने कान्झावाला में 1 महीने तक प्रदर्शन किया अंत में सरकार ने यूनियन की मांगों को मान लिया, इस सफलता के बाद चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन पर भारतीय किसान यूनियन ने दिल्ली में विशाल रैली का आयोजन किया !
भारतीय किसान यूनियन की शाखाएं दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में हैं, उत्तर प्रदेश में किसान यूनियन का प्रभाव क्षेत्र मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश है जहां जाटों की संख्या बहुत ज्यादा है ।
कांग्रेस दल की ओर से 16 फरवरी 1981 के दिन दिल्ली में एक विशाल किसान रैली संपन्न हुई, जिसमें लगभग 25 लाख किसानों ने भाग लिया! इस रैली के आयोजन का मुख्य उद्देश्य केवल यह दिखाना था कि देश के किसानों का बहुत बड़ामत कांग्रेस दल के साथ है !
वर्ष 1986 में उत्तर प्रदेश सरकार ने विद्युत मूल्य 22.50 रुपए से बढ़ाकर ₹30 प्रति हार्सपावर कर दिया, भारतीय किसान यूनियन ने इस वृद्धि का घोर विरोध किया, जनवरी से मार्च 1987 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर में निरंतर हिंसात्मक आंदोलन प्रारंभ हुए जिसमें बहुत से किसान मारे गए, सरकार की दमनात्मक नीति के मुकाबले में किसान न ठहर सके ! 20 फरवरी 1988 को महेंद्र सिंह टिकैत ने अपना आंदोलन वापस ले लिया, किसानों की कोई भी मांग पूरी ना हो सकी, यह आंदोलन 25 दिनों तक चलने के बाद बिना किसी समझौते के समाप्त हो गया, इस आंदोलन के बाद स्वयं महेंद्र सिंह टिकैत ने कहा कि सरकार से किसानों को गोलियों और डंडों के अतिरिक्त और कुछ ना मिल सका।

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