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सिनेमा का विकास या विनाश

भारत में सिनेमा (Cinema) की शुरुआत

जब भी हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema) की बात आती है तो 1913 में आई पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र का जिक्र जरूर ही होता हैं, ये भारत में बनी पहली फूल-लेंथ फीचर फिल्म थी, इसका प्रीमियर 3 मई, 1913 को मुंबई (तब बॉम्बे) के कोरोनेशन सिनेमा (Coronation Cinema) में हुआ था। किसान कन्या वर्ष 1937 की हिंदी रंगीन (सिनेकलर) विशेषता​वाली फिल्म थी।

मूक फिल्में (1890 से 1920)

इस दौर में जो फिल्मे आई उनमे साउंड नहीं हुआ करता था।

टॉकीज़ (1930-मध्य -1940 के दशक)

अर्देशिर ईरानी ने पहली भारतीय बोलती फिल्म आलमआरा 14 मार्च 1931 को रिलीज़ की। यह सच में हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema) जगत में क्रांति का दौर था उस वक़्त फिल्मो में प्रयोग का दौर जारी था, दादा साहेब फाल्के, सत्यजीत रे, पृथ्वी राज कपूर का अहम् योगदान है है फिल्म जगत को स्थापित करने में।

भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) का स्वर्णिम युग

भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम युग आज़ादी के बाद आया जिसमे कई फिल्मों की गिनती समीक्षकों और निर्देशकों के मतानुसार सर्वकालीन श्रेष्ठ फिल्मे में की जाती है।

इस दौरान दक्षिण भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) महा ग्रन्थ महाभारत पर आधारित कुछ फिल्म निर्माण हुए जैसे मायाबाज़ार इसके बाद आधुनिक भारतीय सिनेमा का दौर 1970 से शुरू हुआ इस दौरान बहुत सारे ऐसे प्रयोग हुए जिन्होंने हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema) को समाज का आइना बना दिया।

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इस दौरान आई फिल्मो में एक सामाजिक सन्देश हुआ करता था, आनंद (1971), अमर प्रेम (1971), कटी पतंग (1972), शोले (1975), अमर अकबर अन्थोनी, दीवार, संसार, सारांश को कौन भूल सकता है।

यह दौर नब्बे तक जारी रहा जिसमे दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, हम आपके हैं कौन, मैंने प्यार किया जैसी तमाम फिल्मे शामिल रही जिन्होंने समाज को प्यार करना सिखाया, उस दौर में विलन (खलनायक ) बनना एक बहुत रिस्क वाला काम होता था।

क्योकि उस दौर में लोग सिनेमा (Cinema) सिर्फ देखते नहीं थे उसे अपने जीवन में आत्मसात भी करते थे। यही वजह है की हीरो अपने करैक्टर को सोच समझकर चुनते थे।

आपको बता दे की बाजीगर मूवी शाहरुख़ से पहले अजय देवगन को ऑफर हुई थी लेकिन उसके नेगेटिव इम्पैक्ट की वजह से अजय देवगन ने इंकार कर दिया था। मिथुन के प्यार का मंदिर “इसे प्यार का मंदिर कहते है” इस टाइटल ट्रैक को कौन भूल सकता है, ” ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे ” शोले की ये क्लासिक गीत कालजई हो गई।

सिर्फ दौलत से परवरिश नहीं होती आपके बेटे को आपका समय और प्यार भी चाहिए प्राण साहब और अमिताभ बच्चन की शराबी को कौन भूल सकता है, “मेरे पास माँ है” दीवार के इस संवाद को आज भी लोग याद करके भावुक हो जाते है।

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इन सभी मूवीज में एक बात कॉमन होती थी अच्छे रास्ते पर चलने वाले को आखिरी में जीतता हुआ दिखाया जाता था।

पैसा बनाने के लिए सामाजिक चेतना से खिलवाड़ नहीं किया जाता था, ना ही किसी तरह का पार्ट 2,3,4 बनता था, आज का दौर होता तो सोचिये शोले के कितने पार्ट आ चुके होते।

दीवार, मुकदर का सिकंदर में क्लाइमेक्स सिन होता ही नहीं, हीरो फिर से अगले पार्ट में ज़िंदा हो जाता। आज की 90% ऐसी फिल्मे आती है जिसे आप परिवार के साथ नहीं देख सकते, जानबूझकर युवाओं को गुमराह करने के लिए एनिमल जैसी हिंशक मूवी बनाई जाती है।

आज का सिनेमा (Cinema) दौर एक ड्रग्स की तरह है जिसने युवाओं को अपने गिरफ्त में ले रखा है इतना ही नहीं इसमें वेब सीरीज ने इसमें आग में घी का काम किया है, चूँकि वेब सीरीज पर सेंसर बोर्ड की कैची नहीं होती इसलिए वहाँ और हिंसा वल्गरिटी दिखाने की छूट मिल जाती है।

वर्तमान समय में आप देखेंगे की 90 % मूवीज हमारे संस्कार संस्कृति का मखौल उड़ाती नज़र आती है जैसे आदिपुरुष जैसे महंगे बजट में हनुमान जी का संवाद अपुन छोड़ेगा नहीं तुमको, ऐसे बहुत सारे सीरीज मिल जायेंगे जिसमे महाभारत का भुर्ता बनता नज़र आएगा, तब एक छोटे से गाँव में नदिया के पार जैसे फिल्मो की शूटिंग हो जाती थी और वह क्लासिकल हिट साबित होती थी।

दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे में हीरो का यह कहना की मैं हीरोइन को भगा कर नहीं ले जाऊंगा, वीर ज़ारा में शाहरुख़ और किरण खेर का संवाद, हीरो का अंत तक सिर्फ इसलिए चुप रहना की वो जिससे प्यार करता है वो बदनाम ना हो जाये।

इसमें उस वक़्त के राइटर का भी योगदान माना जायेगा 70 – 80 के लेखक सलीम, समीर, गुलजार सहित कादर खान के वो डयलॉग हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है।

जिंदगी में तूफ़ान आए, क़यामत आए लेकिन दोस्ती में दरार न आने पाए। क़त्ल करते हैं हाथ में तलवार भी नहीं। दुनिया मेरा घर है, बस स्टैंड मेरा अड्डा है, जो फिल्मो में चार चाँद लगा दिया करते थे, दोस्त की बहन को भी अपनी बहन वाला इज़्ज़त देना। हीरोइन को छेड़ते हुए गुंडों से हीरो का भिड़ जाना।

वैसे इस दौर को आप सिनेमा जगत का विकास कह सकते है AI, VFX के दौर में सिनेमा (Cinema) हॉल में एक फ्रिक्शन भरा माहौल क्रिएट किया जाता है एक फैंटेसी की हिंसक दुनिया, सबकुछ अद्भुत लेकिन इसके साथ दुनिया भर के गंदे संवाद।

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ऐसे ऐसे सिन जो आपको विचलित कर दे इन सभी बातों को आप विकास नहीं बोल सकते है, अब फिल्मो के नाम देखिये लव सेक्स धोखा और इनका पार्ट भी बन जाता है लव सेक्स धोखा पार्ट 2, रागिनी एम एम यस पार्ट 2

अब हाल ही में आई एनिमल को आप देखिये इतनी हिंसा तो जानवर भी नहीं करते जितना एनिमल के नाम पर एनिमल मूवी में हीरो को करते दिखाया गया है।

सिने जगत को चाहिए की इस पर चिंतन करे क्योकि सिनेमा (Cinema) समाज का मार्गदर्शन भी करता है, संवाद, वेश भूषा, अनुसाशन, रिश्ता, प्यार, संबंध निभाना सब कुछ सिखाता है इसलिए जरुरी है की इस पर विचार किया जाए।

प्रोडूसर डायरेक्टर सिर्फ और सिर्फ पैसे के लिए मूवी ना बनायें उनकी कुछ जिम्मेदारी देश के लिए भी बनती है जिसका निर्वहन आप लोगो को करना चाहिए।

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