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किसान आंदोलन – एक समीक्षा

किसान आंदोलनों (Farmer Protest) की मांग

देश के अलग-अलग क्षेत्रों में हुए किसान आंदोलनों (Farmer Protests) का अध्ययन करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि छोटी-मोटी स्थानीय समस्याओं के अतिरिक्त पूरे देश में किसानों की कुछ सामान्य मांगे रही हैं जैसे कि –

  • उत्पादन का लाभकारी मूल्य
  • करों में कमी
  • बिजली दरों में कमी
  • सरकारी ऋण की माफी
  • मौलिक भूमि-सुधार
  • खाद तथा कृषि यंत्रों के लिए अनुदान
  • सिंचाई की सुविधा
  • सस्ते मूल्य पर दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं की व्यवस्था
  • कृषि श्रमिकों की मजदूरी दर में वृद्धि

जहां तक इन मांगों के पूरा होने की बात है केवल यह कहा जा सकता है कि किसानों की मूल समस्याओं का कोई स्थायी हल राष्ट्रीय स्तर पर अभी तक नहीं निकल पाया है।

विभिन्न राज्यों में हुए किसान आंदोलन (Farmer Protest) के कारण राज्य सरकारों ने समय-समय पर कुछ मांगों को भले ही मान लिया हो लेकिन भारत सरकार ने ऐसी कोई स्थायी नीति या योजना नहीं बनाई जिससे किसानों की मुख्य समस्याओं का निराकरण हो पाए।

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इसका अर्थ यह है कि साधारण प्रकार की रियायतें प्राप्त करने और छोटे-छोटे मुद्दों के लिए किसानों को निरंतर संघर्षरत रहना पड़ा है। इस द्रष्टि से किसान आंदोलन (Farmer Protest) हिंसात्मक होते हुए भी बहुत अधिक और स्थायी रूप में प्रभावी सिद्ध नहीं हुए हैं।

क्या किसान आंदोलन (Farmer Protest) जाति मुद्दों पर हुए?

संख्या में बहुत ज्यादा होते हुए भी किसान समुदाय, धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति, तथा क्षेत्रीय आधार पर विभाजित है। पारस्परिक प्रतिद्वंदता के कारण किसान अपने सामूहिक हितों के लिए सुसंगठित रूप से कार्य नहीं कर पाते हैं।

Farmer Protest

ऐसा लगता है कि विभिन्न राज्यों में होने वाले अधिकांश किसान आंदोलन जाति आधारित आंदोलन रहे हैं, उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में शरद जोशी द्वारा चलाए गए आंदोलन में मुख्य रूप से उच्च जाति के किसान सक्रिय रहे, जबकि दलित वर्ग का बहुत अधिक समर्थन उन्हें नहीं मिल पाया।

जो कि स्वयं ब्राह्मण हैं और मराठा जाति के किसान मुख्य रूप से उनके साथ हैं, इसी प्रकार गुजरात में किसान आंदोलन (Farmer Protest) का नेतृत्व पटेल समुदाय के हाथों में रहा है, उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन द्वारा चलाया गया आंदोलन मुख्यतः जाट किसानों का आंदोलन है और इसीलिए राज्य के उन जिलों तक सीमित रहा जहां जाटों की संख्या बहुत ज्यादा है।

दक्षिण भारत का किसान आंदोलन (Farmer Protest)

यह भी कहा जाता है कि दक्षिण भारत में किसानों में अधिकांश आंदोलन धनी और बड़े किसानों द्वारा संचालित थे, खाद्यान्न को लाभकारी मूल्य की मांग या बिजली दरों में कमी से छोटे किसानों की अपेक्षा बड़े किसानों को अधिक लाभ होता है, किसानों की एक श्रेणी कृषि कामगारों की है जिनके पास स्वयं भूमि नहीं है वह केवल मजदूरी पर खेतों में काम करते हैं, कुछ आंदोलन में यह भी सम्मिलित रहे हैं।

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छोटे किसानों के पास ना तो ट्यूबवेल है और ना ही ट्रैक्टर, ना अन्य कृषि के उपकरण इसलिए किसान आंदोलन (Farmer Protest) में उठाई गई मांगों में बड़े किसानों का हित ज्यादा निहित था।

क्यों किसान आंदोलन (Farmer Protest) सभी किसान नहीं करते?

उत्पादन की दृष्टि से भी किसान विभाजित है गन्ना उत्पादक और कपास उत्पादकों की अलग-अलग समस्याएं हैं इसलिए जब गन्ने के मूल्य को बढ़ाने की बात होती है तो सारा किसान वर्ग उसमें ज्यादा रुचि नहीं लेता है, इस स्थिति के फलस्वरूप ऐसे कम आंदोलन हुए हैं जिसमें एक राज्य विशेष के समस्त किसानों ने सुसंगठित रूप से आंदोलन में प्रतिभाग किया हो। इससे किसान-शक्ति स्वाभाविक रूप से क्षीण होती है।

Farmer Protest

साधनों की दृष्टि से किसान असहाय से दिखाई देते हैं वे विरोध रूप में अपने खेतों को बहुत दिनों तक खाली नहीं छोड़ सकते अगर वह फसल पैदा ना करें तो अधिकांश किसानों का जीविकोपार्जन असंभव हो जाएगा, यदि रेलवे के कर्मचारी हड़ताल करते हैं तो उससे सरकार को भारी हानि होती है इसलिए सरकार ऐसी स्थिति आने से घबराती है।

यदि किसान उत्पादन ना करें तो वे भूखे मर जाएंगे, आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण किसान यह भी नहीं कर सकता कि अपने उत्पादन को अधिक दिनों तक अपने पास रोके रहे और अधिक मूल्य मिलने के इंतजार में उसे बाजार में ना दे! विशेष कर छोटे किसानों में तो प्रतीक्षा क्षमता बहुत ही कम होती है।

क्यों स्वयं किसान संगठनों ने किसान आंदोलन (Farmer Protest) वापस ले लिया?

विभिन्न किसान आंदोलनों (Farmer Protests) में, रैली, प्रदर्शन, रास्ता रोको, जेल भरो और गांव बंदी के साधनों को सामान्य रूप से अपनाया गया यह समस्त साधन ऐसे हैं जिनका प्रत्यक्ष प्रभाव जनसाधारण पर पड़ता है इसलिए यातायात रोकने का कार्यक्रम ज्यादा दिनों तक नहीं चलाया जा सकता क्योंकि इससे किसानों के प्रति जन-सहानुभूति नहीं रह जाती।

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यही कारण था कि महाराष्ट्र, कर्नाटक , गुजरात तथा उत्तर प्रदेश में चलाए गए आंदोलनों को स्वयं किसान संगठनों ने स्थगित कर दिया या उन्हें वापस ले लिया। उदाहरण के लिए 1987-88 में उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का इतना बड़ा आंदोलन हुआ कि उसने सरकार को हिला दिया लेकिन अंत में सरकार के कठोर रवैये को देखकर टिकैत को आंदोलन वापस लेना पड़ा।

क्या किसान आंदोलन (Farmer Protest) में राजनीतिक दलों की भी भूमिका थी?

विगत दशकों में निर्मित अधिकांश किसान संगठनों ने अपने को राजनीतिक दलों से असंबद्ध रखने का दावा किया उत्तर प्रदेश में तो टिकैत ने सत्ता तथा विपक्ष के किसी नेता को अपने मंच से बोलने तक का अवसर नहीं दिया, लेकिन व्यावहारिक रूप से अधिकांश किसान आंदोलन (Farmer Protest) में राजनीतिक दलों ने सक्रिय भूमिका अदा की।

Farmer Protest

उदाहरण के लिए 1986 में गुजरात में हुआ किसान आंदोलन आरंभ में अराजनीतिक रहा लेकिन बाद में विरोधी दलों के नेता इसमें सम्मिलित हो गए, महाराष्ट्र में हुए कपास उत्पादक आंदोलन का समर्थन शिवसेना तथा दलित नेता प्रकाश आंबेडकर तथा कुछ वामपंथी दलों ने किया, महाराष्ट्र के किसान नेता शरद जोशी ने 1980 में यह घोषणा की थी कि “मैं अपनी जिंदगी में ना वोट मांगूंगा ना किसी राजनीतिक दल को समर्थन दूंगा” इसके बिलकुल विपरीत 1987 में उन्होंने कहा कि “टकराव का काल समाप्त हो गया है अब सहयोग का युग प्रारंभ होना है“।

शरद जोशी ने कहा कि वह चुनाव लड़ेंगे और तीन चार वर्षो में कांग्रेस का विकल्प उपस्थित करेंगे वास्तविकता यह है कि किसान संगठन अपने को दलीय प्रभाव से मुक्त नहीं रख सकते, राजनीतिक दलों के समर्थन के बगैर आंदोलन में जान नहीं आती लेकिन उसका परिणाम यह होता है कि सत्तारूढ़ दल उनकी मांगों को भी स्वीकार करने में संकोच करता है क्योंकि वह इसका श्रेय विपक्षी दलों को नहीं देना चाहते हैं।

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राष्ट्रीय स्तर पर कृषकों के प्रभावी संगठनों का निर्माण और विकास न होने का एक अन्य कारण कृषक का अशिक्षित होना भी है। कृषक जनता अपने अधिकारों, कर्तव्यों का पूर्ण ज्ञान न होने के कारण आसानी से गुमराह की जा सकती है और विभिन्न राजनीतिक दल तथा क्षेत्रीय नेता इस स्थिति से पूरा लाभ उठाते रहे हैं।

कृषकों की दयनीय स्थिति का एक प्रमुख कारण ग्रामीण क्षेत्र में सामंतवादी वर्ग का प्रभाव जमींदारी उन्मूलन के बाद भी भूतपूर्व राजाओं और जमींदारों का प्रभाव कुछ क्षेत्र में बहुत ज्यादा है और कृषक वर्ग उनके कहने पर मताधिकार जैसे मूल्यवान अधिकार का प्रयोग करते हैं विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव में प्रायः भूतपूर्व जमीदारों के माध्यम से कृषकों का समर्थन प्राप्त करते हैं।

और इससे जमीदार वर्ग विधायकों और प्रशंसकों के संपर्क में रहता है कृषक जनता का एक बड़ा भाग अभी यह समझता है कि बिना इन जमींदारों की सहायता के वे सरकार के द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं से लाभान्वित नहीं हो सकते हैं, प्रशासकीय पदाधिकारी के अत्याचार से अपने को सुरक्षित नहीं रख सकते हैं परिणाम यह है कि?

जमींदारी उन्मूलन के बाद भी भूतपूर्व जमीदारों का राजनीति पर प्रभाव समाप्त नहीं हुआ है और आज 21वीं सदी में भी हमारे देश में भूतपूर्व राजाओं और जमीदारों का यह दंश किसानों का एक बड़ा वर्ग झेलता है।

 

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