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‘ऑल इंडिया किसान सभा’ का इतिहास

भारत की लगभग 70 फ़ीसदी आबादी गांवों में निवास करती है, और ग्रामीण जनता का 90 फ़ीसदी भाग कृषि के द्वारा अपना जीविकोपार्जन करता है, इस दृष्टि से किसान वर्ग भारत के आर्थिक हितों में सबसे बड़ा वर्ग है, जो अपनी समस्याओं की दृष्टि से भी अन्य समूहों से बिल्कुल अलग है! लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि इतना बड़ा वर्ग होते हुए भी कृषक समाज अब तक सुसंगठित नहीं हो सका है !

किसानों को संगठित करने के प्रयत्न और किसान आंदोलन का आरंभ 19वीं शताब्दी में तब हुआ जब बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब आदि में किसानों द्वारा आंदोलन हुए, लेकिन इन आंदोलनों का कोई विशेष प्रभाव सरकार पर नहीं पड़ा! साल 1917 में गांधी जी ने बिहार के चंपारण के किसानों को संगठित किया और गुजरात में लगान वसूली के खिलाफ 1918 में एक सत्याग्रह कराया, वर्ष 1920 में गांधी जी के हाथों में कांग्रेस का नेतृत्व आने के पश्चात गांधी जी ने ग्रामीण जनता का समर्थन प्राप्त करने पर विशेष बल दिया और किसानों को संगठित करने की ओर विशेष ध्यान देने लगे ! साल 1928 में लगान के विरुद्ध “बारदोली सत्याग्रह” हुआ और 1932 में जूट और रुई के उत्पादकों को कांग्रेस द्वारा संगठित किया गया ! साल 1936 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में एक कृषि सुधार योजना अपनाई गई, इसी वर्ष कुछ कांग्रेसियों और साम्यवादी दल के कुछ नेताओं द्वारा “ऑल इंडिया किसान कांग्रेस” की स्थापना की गई ! कांग्रेस से अलग इस प्रकार के संगठन बनाने का विरोध कुछ कांग्रेसियों की ओर से किया गया जिसके फलस्वरूप साल 1937 में इस संगठन के नाम से कांग्रेस शब्द को निकाल दिया गया और “सभा” शब्द जोड़ा गया, साल 1939 में “ऑल इंडिया किसान सभा” के तत्कालीन अध्यक्ष आचार्य नरेंद्रदेव ने कांग्रेस से अलग संगठन का निर्माण किए जाने के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए यह कहा था कि कांग्रेस से बहुवर्गीय संगठन है जिसमें किसानों के हितों की पूर्ति समुचित रूप से नहीं हो रही है ! उदाहरण के लिए कांग्रेस में जमीदारों के प्रभाव के कारण बहुत से भूमि सुधार संबंधी अधिनियम कार्यान्वित नहीं हो सके, अतः किसानों का एक पृथक संगठन किसानों की विशेष समस्याओं को हल करने में सहायक हो सकेगा !
किसान सभा एक संघीय संगठन था, जिसमें विभिन्न राज्यों के कुछ किसान संगठन के सदस्य थे, साल 1937 में कांग्रेस द्वारा 8 राज्यों में मंत्रिमंडल का निर्माण किया गया, इन कांग्रेसी सरकारों ने ज़मीदारी उन्मूलन की योजना नहीं बनाई, जिसके कारण कृषक वर्ग इन सरकारों से असंतुष्ट था ! किसान सभा की ओर से पंजाब में लगाए जाने वाले करों के खिलाफ और बिहार में जमींदारी उन्मूलन तथा लगान घटाना आदि मांगों के लिए आंदोलन चलाया गया ! साल 1939 में मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने के बाद कांग्रेस नेता जेल चले गए और किसान सभा पर साम्यवादी दल का आधिपत्य स्थापित हो गया !

द्वितीय विश्व युद्ध के संबंध में किसान सभा ने साम्यवादियों के साथ ब्रिटेन की नीति का समर्थन किया और इस प्रकार कांग्रेस का विरोध किया ! परिणाम यह हुआ कि किसान सभा से गैरसाम्यवादी व्यक्तियों ने अपने संबंध तोड़ लिए, साल 1942 में कांग्रेस द्वारा चलाए गए ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में कांग्रेस के बहुत से नेता जेल चले गए और किसान सभा को कृषकों को संगठित करने का पूरा अवसर मिला !
युद्ध समाप्त होने के समय तक किसान सभा में आंतरिक विरोध उत्पन्न हो गया और साल 1944 में बिहार के अत्यधिक प्रभावशाली किसान नेता स्वामी सहजानंद किसान सभा से अलग हो गए, उनका आरोप यह था की साम्यवादी दल ने पाकिस्तान की मांग के संबंध में मुस्लिम लीग का समर्थन किया था !स्वामी सहजानंद ने एक पृथक संगठन “ऑल इंडिया यूनाइटेड किसान सभा” के नाम से संगठित किया !

स्वतंत्रता के पश्चात जब साम्यवादी दल पर प्रतिबंध लगाया गया तो किसान सभा पर भी रोक लगा दी गई ! यह प्रतिबंध साल 1950 तक चलता रहा, 1950 में किसान सभा ने इस बात का प्रयत्न किया कि किसान सभा से अलग हुए व्यक्ति उसमें पुनः वापस आ जाएं लेकिन इसमें कोई सफलता नहीं मिली ! साल 1954 में ऑल इंडिया किसान सभा ने 10,87,000 सदस्य संख्या होने का दावा किया जो 1956 में घटकर महज़ 73,600 ही रह गई !

साल 1957 के चुनाव में किसान सभा ने साम्यवादी दल के उम्मीदवारों का समर्थन किया लेकिन ऐसा लगता है कि किसान सभा का किसान मतदाताओं पर कोई विशेष प्रभाव न पड़ा, क्योंकि साम्यवादी दल को इस चुनाव में केवल 15.7 फ़ीसद मत ही मिल सके, किसान सभा की ओर से सामान्य रूप से करो को घटाने, 25 एकड़ से अधिक भूमि के वैधानिक ढंग से हस्तांतरित किए जाने की जांच करने, अधिकतम भूमि सीमा को व्यक्तियों के बजाय परिवारों पर लगाने, लघु सिंचाई योजनाएं बनाने, अप्रत्यक्ष करों में कमी करने, औद्योगिक वस्तुओं और कृषि वस्तुओं के मूल्य के बीच संतुलन स्थापित करने आदि की मांग की गई !

वर्ष 1957 में हुए 15वें प्रादेशिक सम्मेलन में किसान सभा ने इस बात की घोषणा की, कि वह कृषि के लिए ऋण, सिंचाई सुविधाओं में सुधार, खाद्यान्न, शिक्षा, स्वास्थ्य, पीने का पानी तथा सिंचाई की दर को कम करने के लिए आंदोलन चलाएगी! सभा ने यह भी घोषणा की, कि वह वर्तमान विधायिनी में रहते हुए अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूर्ण प्रयत्न करेगी !
किसान सभा और यूनाइटेड किसान सभा के अतिरिक्त विभिन्न राज्यों में किसानों के अलग-अलग संगठन संगठित किए जाते रहे, जिसमें फार्मर्स फोरम, किसान पंचायत आदि प्रमुख हैं लेकिन इनमें से कोई भी संगठन अधिक लोकप्रियता नहीं प्राप्त कर सका ।

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