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लोकसभा अध्यक्ष पद का इतिहास,देश में अब तक के लोकसभा अध्यक्ष

अपने इस विशेष अंक में आज हम बात करेंगे भारतीय राजनीतिक इतिहास में अब तक के लोकसभा अध्यक्षों की ।
हाल ही में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर से ओम बिरला लगातार दूसरी बार 18वीं लोकसभा के अध्यक्ष बन गए हैं !
आमतौर पर स्पीकर सत्तारूढ़ दल का ही होता है और उपाध्यक्ष यानि डिप्टी स्पीकर विपक्ष का होता है !
संख्या बल के लिहाज से नवनिर्वाचित लोकसभा में चूंकि सत्तारूढ़ गठबंधन के पास पर्याप्त बहुमत है, इसलिए उनके उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित थी,
लोकसभा अध्यक्ष पद के इतिहास में पहली लोकसभा यानि 1952 से लेकर 1991 में दसवीं लोकसभा तक तो सत्तारूढ़ दल का सदस्य ही इस पद के लिए निर्वाचित होता रहा !
किन्तु हाल के दशकों में जब से गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, तब से यह परंपरा टूटी और कई मौक़े ऐसे आए, जब इस पद पर सत्तारूढ़ दल के बजाय उसके सहयोगी अथवा उसकी सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले दल के सदस्य को इस पद के लिए चुनकर अध्यक्ष पद पर सुशोभित किया गया !
निम्न सदन (लोकसभा) अध्यक्ष चाहे जिस भी दल का सदस्य चुना जाए, लेकिन माना जाता है कि चुने जाने के बाद उसकी दलीय सम्बद्धता औपचारिक तौर पर ख़त्म हो जाती है और वह दलीय गतिविधियों से अपने आप को दूर कर लेता है !
उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दलीय हितों और भावनाओं से ऊपर उठकर सदन की कार्यवाही का संचालन करते हुए सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्षी सदस्यों के अधिकारों का भी पूर्ण संरक्षण करेगा !

स्पीकर पद के लिए अब तक हुए चुनाव

लोकसभा अध्यक्ष के लिए आदर्श स्थिति यही मानी गई कि इस पद का निर्वाचन सर्वसम्मति से होना चाहिए, लेकिन 1952 में गठित पहली लोकसभा स्पीकर के लिए चुनाव की स्थिति आ गई और कांग्रेस के गणेश वासुदेव मावलंकर के सामने शंकर शांताराम मोरे ने चुनाव लड़ा, शांताराम मोरे, पीजेंट्स एंड वर्कर पार्टी ऑफ़ इंडिया के नेता थे लेकिन उन्हें सभी वामपंथी दलों का का समर्थन मिला और मावलंकर को 394 वोट मिले, जबकि 55 सांसदों ने मोरे का समर्थन किया था !
साल 1956 में उनके आकस्मिक निधन के बाद शेष कार्यकाल के लिए उनकी जगह पर कांग्रेस के ही अनंतशयनम अयंगार का चुनाव भी निर्विरोध हुआ, इससे पहले तक अयंगार लोकसभा उपाध्यक्ष रह चुके थे !
उसके बाद साल 1957 में दूसरी लोकसभा के अध्यक्ष भी अयंगार ही चुने गए, इस बार भी उनका निर्वाचन निर्विरोध ही हो गया !
वर्ष 1962 में तीसरी लोकसभा में सरदार हुकुम सिंह और चौथी लोकसभा में नीलम संजीव रेड्डी भी स्पीकर पद पर निर्विरोध निर्वाचित हुए थे !
इन सभी लोकसभा अध्यक्षों का सदन की कार्यवाही के दौरान सरकार की ओर झुकाव होते हुए भी उनकी भूमिका को कमोबेश निर्विवादित ही माना गया या यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि इनका कार्यकाल बतौर लोकसभा अध्यक्ष संतोषजनक रहा !
तीसरी लोकसभा तक तो संख्या बल के दृष्टिकोण से विपक्ष की स्थिति सत्ता पक्ष के मुक़ाबले बेहद ही कमज़ोर थी, लेकिन कम संख्या में होते हुए भी उस समय विपक्ष में प्रतिभाओं का अभाव नहीं था और उस समय सदन में देश के विभिन्न राज्यों से अनेक प्रतिभाएं मौजूद थी !
उस दौर में एके गोपालन, श्रीपाद अमृत डांगे, प्रो. हीरेन मुखर्जी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, मधु लिमये, किशन पटनायक, महावीर त्यागी, अटल बिहारी वाजपेयी, नाथ पई, मीनू मसानी, हरिविष्णु कामत जैसे नेता विपक्ष में थे, जिनका अध्ययन के साथ ही सड़क यानि जनता से भी गहरा नाता था !
यह सभी दिग्गज पूरी तैयारी के साथ सदन में आते थे, इसलिए लोकसभा अध्यक्ष भी न तो एक सीमा से अधिक सत्तापक्ष का बचाव कर पाते थे और न ही सदन की कार्यवाही के नियमों की व्याख्या कर विपक्षी सदस्यों को मुद्दे उठाने से रोक पाते थे!
विपक्षी सदस्य भी नियमों को लेकर इतने सचेत रहते थे कि कई मौक़ों पर वे अध्यक्ष की व्यवस्था को चुनौती भी देते थे और अध्यक्ष को भी मजबूर होकर उनकी दलील स्वीकार करनी पड़ती थी !
इसमें तीसरी लोकसभा का एक वाक़या बेहद दिलचस्प है, छत्तीसगढ़ में बस्तर की आदिवासी रियासत के पूर्व महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव आदिवासियों के बीच उस वक्त ख़ासा लोकप्रिय रहे !
साल 1966 में आदिवासियों के एक आंदोलन का नेतृत्व करते हुए पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में उनकी मौत हो गई !
उक्त प्रकरण को डॉ. लोहिया ने लोकसभा मे उठाया, तत्कालीन अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह ने कहा कि यह मामला क़ानून व्यवस्था से सम्बंधित है और राज्य सरकार के तहत आता है, इसलिए इसे यहां नहीं उठाया जा सकता है।
लोकसभा अध्यक्ष की इस व्यवस्था पर मधु लिमये ने कहा था कि क़ानून व्यवस्था का मामला ज़रूर राज्य के अंतर्गत आता है लेकिन आदिवासी कल्याण का मामला केंद्र सरकार से जुड़ा हुआ है बस्तर में आदिवासियों पर जुल्म हुआ है, आंदोलन और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के उनके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है, इसलिए यह मामला यहां उठाया जा सकता है लिमये की इस दलील का विपक्ष के अन्य सदस्यों ने भी समर्थन किया, अंतत: लोकसभा अध्यक्ष को अपनी व्यवस्था वापस लेते हुए भंजदेव की हत्या से संबंधित मामले पर चर्चा की अनुमति देनी पड़ी थी।

चौथी लोकसभा यानि 1967 में कांग्रेस के नीलम संजीव रेड्डी अध्यक्ष चुने गए !
उस समय लोकसभा में संख्या बल के लिहाज से विपक्ष भी काफ़ी मज़बूत था और इसलिए चुनाव हुआ था !
कांग्रेस के नीलम संजीव रेड्डी के सामने उनके प्रतिद्वंदी के रूप में निर्दलीय टी. विश्वनाथम थे लेकिन उन्हें विपक्ष के सभी दलों का समर्थन प्राप्त था !
नीलम संजीव रेड्डी को 278 मत मिले जबकि उनके सामने विश्वनाथम को 207 मत मिले थे, वोटों के लिहाज से ये सबसे क़रीबी चुनाव रहा है !
किन्तु इसके बाद वे महज दो वर्ष ही इस पद पर रहे क्योंकि 1969 में राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित होने पर उन्होंने स्पीकर पद से त्यागपत्र दे दिया था !
बतौर लोकसभा अध्यक्ष उनका भी कार्यकाल कमोबेश निर्विवाद ही रहा, उनके स्थान पर कांग्रेस के ही गुरुदयाल सिंह ढिल्लों स्पीकर चुने गए वे चौथी लोकसभा के बचे हुए कार्यकाल तक अध्यक्ष रहे और उसके बाद पांचवीं लोकसभा में भी लोकसभा अध्यक्ष बने !
वह पांचवीं लोकसभा में इस पद पर रहे और बाद में दिसंबर 1975 में इस्तीफ़ा देकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गए !
बाद में उनके स्थान पर बलिराम भगत स्पीकर निर्वाचित हुए और छठी लोकसभा का गठन होने तक इस पद पर बने रहे, बलिराम भगत के सामने विपक्ष ने जनसंघ के जगन्नाथ राव जोशी को मैदान में उतारा, बलिराम भगत को 344 वोट मिले जबकि जगन्नाथ राव जोशी को महज़ 58 मत ही मिले थे।
इसके बाद 1977 में छठी लोकसभा का गठन हुआ, इस लोकसभा का चेहरा परिवर्तित था पहली बार कांग्रेस विपक्ष में थी और पांच दलों के विलय से बनी जनता पार्टी सत्ता में थी !
शुरुआत में जनता पार्टी की तरफ से नीलम संजीव रेड्डी का नाम लोकसभा अध्यक्ष के लिए प्रस्तावित हुआ और वे निर्विरोध चुन लिए गए, लेकिन इस बार वे सिर्फ चार महीने ही इस पद पर रहे ! जुलाई 1977 में वे राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए और उनकी जगह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे केएस हेगड़े लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए !
केएस हेगड़े का कार्यकाल चुनौती भरा रहा, लेकिन उनकी भूमिका निर्विवाद ही रही ! क्योंकि छठी लोकसभा अपना निर्धारित कार्यकाल पूर्ण किए बिना ही भंग हो गई थी, जिसके फलस्वरूप 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए और सातवीं लोकसभा अस्तित्व में आ गई थी ! सातवीं लोकसभा के अध्यक्ष बलराम जाखड़ चुने गए, वे पूरे कार्यकाल तक इस पद पर बने रहे और आठवीं लोकसभा में भी उन्होंने पुनः यही दायित्व संभाला, इस तरह वे लगातार 10 वर्षों तक इस पद पर रहने वाले पहले स्पीकर भी हुए !
साल 1989 में नौवीं लोकसभा अस्तित्व में आई, इसी लोकसभा से देश में गठबंधन की राजनीति का दौर भी शुरू हुआ और केंद्र में पहली बार गठबंधन की सरकार भी बनी !
समाजवादी नेता रवि राय सत्तारूढ़ जनता दल की ओर से बिना किसी विरोध के अध्यक्ष चुने गए, उनका कार्यकाल छोटा और चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन कोई विवाद उनके साथ भी नहीं जुड़ा अतः वह भी निर्विवाद ही रहे!
वर्ष 1991 में देश ने फिर मध्यावधि चुनाव का सामना किया और दसवीं लोकसभा अस्तित्व में आई, इस लोकसभा में सत्तारूढ़ कांग्रेस की ओर से शिवराज पाटिल अध्यक्ष चुने गए, उनका भी चुनाव निर्विरोध ही हुआ लेकिन इस पद पर उनकी भूमिका औसत दर्जे की ही मानी गई ।
साल 1996 में ग्यारहवीं लोकसभा का चुनाव हुआ, केंद्र में एक बार फिर से गठबंधन की सरकार बनी, इस सरकार को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था ! इस लोकसभा में अध्यक्ष के निर्वाचन में एक नया प्रयोग हुआ, सत्तारूढ़ दल या गठबंधन ने यह पद अपने पास न रखते हुए सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस को दिया ! कांग्रेस की ओर से पूर्वोत्तर के आदिवासी नेता पीए संगमा ग्यारहवीं लोकसभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए, हालांकि वे महज दो वर्ष ही इस पद पर रहे और लोकसभा भंग हो गई, लेकिन वे पहले ऐसे स्पीकर रहे जिनसे सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को कभी भी किसी भी प्रकार की कोई शिकायत नहीं रही ! उन्होंने बहुत ही कुशलतापूर्वक सदन की कार्यवाही का संचालन किया और एक तटस्थ अध्यक्ष के रूप में अपनी अमिट छाप भी छोड़ी, संगमा की एक विशेषता यह भी रही कि हिंदी भाषी न होते हुए भी सदन की कार्यवाही का संचालन करते वक़्त उन्होंने ज्यादातर समय हिंदी में ही वार्तालाप किया उनके मुंह से हिंदी सुनना सदस्यों और सदन की कार्यवाही देखने वाले अन्य लोगों को भी अत्यधिक रुचिकर भी लगता था !
वर्ष 1998 में हुए मध्यावधि चुनाव से 12वीं लोकसभा अस्तित्व में आई, केंद्र में इस बार भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में गठबंधन की सरकार बनी,
इस सरकार ने भी पिछली संयुक्त मोर्चा की सरकार द्वारा शुरू की गई परंपरा को जारी रखते हुए स्पीकर का पद अपने पास नहीं रखते हुए अपनी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही तेलुगू देशम पार्टी को दिया, तेलगू देशम पार्टी की ओर से जीएम बालयोगी निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए, उनके रूप में देश की सबसे बड़ी पंचायत को पहली बार दलित समुदाय का अध्यक्ष भी मिला !
बारहवीं लोकसभा का कार्यकाल भी महज़ एक साल का ही रहा, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर महज़ एक वोट से गिर गई,
तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष बालयोगी चाहते तो उस समय कांग्रेस के सदस्य गिरिधर गोमांग, जो कि उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री बन चुके थे, उनको मतदान में शामिल होने से रोक कर या स्पीकर के रूप में अपने निर्णायक वोट का इस्तेमाल कर सरकार को गिरने से बचा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और स्पीकर के रूप में नैतिकता और निष्पक्षता का एक नया मानदंड स्थापित किया !
असमय सरकार गिरने की वजह से देश को 1999 में फिर मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा, जिसके फलस्वरूप तेरहवीं लोकसभा अस्तित्व में आई, वाजपेयी की अगुवाई में फिर से एक बार गठबंधन की सरकार बनी और बालयोगी ही लोकसभा स्पीकर चुने गए, लेकिन इस बार भी वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और मार्च 2002 में एक विमान दुर्घटना मे उनकी मौत हो गई ! उनके स्थान पर सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल शिव सेना के नेता मनोहर जोशी लोकसभा के अगले अध्यक्ष चुने गए! उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष की उनकी भूमिका को लेकर कई तरह की आशंका जताई गई थीं लेकिन उन्होंने न सिर्फ पीए संगमा और जीएमसी बालयोगी की परंपरा का निर्वाह करते हुए बेहद कुशलता और तटस्थता के साथ अपने दायित्व का निर्वाह किया बल्कि सारी आशंकाओं को निर्मूल भी साबित कर दिया !

जब कांग्रेस ने लेफ्ट के नेता को बनाया लोस अध्यक्ष

जब 13वीं लोकसभा ने अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया और 2004 में चौदहवीं लोकसभा के के लिए चुनाव हुए, इस लोकसभा में भी अध्यक्ष को लेकर पुराने प्रयोग का पुनरावृत्ति जारी रही, यानि सत्तारूढ़ कांग्रेस ने अध्यक्ष का पद अपने पास न रखते हुए सरकार को बाहर से समर्थन कर रही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को दिया, और सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के अध्यक्ष बने, देश के संसदीय इतिहास में यह पहला अवसर था, जब कोई खांटी वामपंथी नेता इस पद पर बैठा था, लंबा संसदीय अनुभव रखने वाले चटर्जी का राजनीतिक कद चूंकि काफ़ी ऊंचा था, लिहाजा कई बार हंगामे को नियंत्रित करने के लिए वे हेडमास्टर जैसी भूमिका में भी दिखाई पड़ते थे !सोमनाथ चटर्जी भी पूरे पांच साल तक स्पीकर रहे 2009 में पंद्रहवीं लोकसभा का गठन हुआ तो सत्तारूढ़ गठबंधन की अगुवाई कर रही कांग्रेस ने इस बार यह पद अपने पास ही रखा और श्रीमती मीरा कुमार के रूप में लोकसभा को पहली महिला अध्यक्ष दिया! उनका कार्यकाल भी बेहद चुनौती भरा रहा, लोकसभा का कोई सत्र ऐसा नहीं रहा जब विपक्ष ने हंगामा और वॉकआउट न किया हो, इसके बावजूद मृदुभाषी मीरा कुमार पूरे संयम के साथ अपना दायित्व निभाती रहीं, हालांकि विपक्ष ने पक्षपात के आरोपों से उन्हें भी कभी बरी नहीं किया !

सोलहवीं लोकसभा और अध्यक्ष पद

इसके ठीक पांच वर्ष बाद यानि 2014 में 16वीं लोकसभा को भी सुमित्रा महाजन के रूप में लगातार दूसरी बार महिला अध्यक्ष मिलीं, हर लोकसभा स्पीकर की निष्पक्षता का पलड़ा थोड़ा-बहुत सरकार की ओर ही झुका रहता है, सुमित्रा महाजन भी इसका अपवाद नहीं रहीं, सदन में कई दफा मंत्रियों को सवालों से घिरता देख ख़ुद उनके बचाव में सामने आईं और प्रश्न, प्रतिप्रश्न तथा पूरकप्रश्न पूछने वाले विपक्षी सदस्यों को नियमों की व्याख्या करते हुए फटकार भी लगाते हुए नजर आई ! महाजन पर ये भी आरोप लगे कि पार्टी के अंदरूनी समीकरणों और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की भाव-भंगिमा को समझते हुए उन्होंने कई सार्वजनिक अवसरों पर लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति को भी उपेक्षापूर्वक नज़रअंदाज भी किया, पांच साल बाद यानि 2019 के चुनाव के पश्चात 17वीं लोकसभा अस्तित्व में आई, भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार भी बनाई, इस बार उसकी ओर से अध्यक्ष के लिए ओम बिड़ला का नाम आगे किया गया, इस लोकसभा में विपक्ष संख्या बल के लिहाज से पूरी तरह निस्तेज था, लिहाजा ओम बिरला निर्विरोध स्पीकर चुन लिए गए, वे इससे पहले महज एक बार ही लोकसभा के सदस्य रहे थे लिहाजा उनके पास संसदीय अनुभव की कमी थी, जो पूरे पांच साल सदन के संचालन के दौरान उनके व्यवहार में झलकती भी रही, उन्होंने विपक्षी सदस्यों के सदन से निलंबन के मामले में इतिहास रचते हुए पूरे कार्यकाल में क़रीब 140 सदस्यों को अलग-अलग समय पर सदन से निलंबित भी किया,
अब 18वीं लोकसभा में एक बार फिर ओम बिड़ला लोकसभा के नए अध्यक्ष बन गए हैं, यानि बलराम जाखड़ और जीएमसी बालयोगी के बाद वे दूसरे ऐसे स्पीकर हैं जो लगातार दूसरी बार इस पद पर बैठे हैं।

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