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जब बड़ी टूट के बाद भी 1971 के चुनाव में इंदिरा की कांग्रेस ने हासिल किया था प्रचंड बहुमत

Indira Congress लोकसभा चुनाव 1971: आज हम अपने इस विशेष अंक में बात करेंगे भारतीय राजनीति में एक ऐसे लोकसभा चुनाव के संबंध में जिसमें देश ही नहीं बल्कि वैश्विक पटल पर भारतीय राजनीति की एक ऐसी मिसाल पेश की जो विरले ही देखने को मिलती है। वर्ष 1971 में भारत में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हुए संविधान के लागू होने के बाद देश में यह पहला अवसर था जब लोकसभा का समय से पूर्व विघटन किया गया।

1971 के चुनाव में इंदिरा कांग्रेस (Indira Congress) ने रचा इतिहास

वर्ष 1971 का निर्वाचन दल प्रणाली के विकास की दृष्टि से अत्यधिक महत्व रखता है, इस निर्वाचन में कांग्रेस संगठन जिसमें कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेता सम्मिलित थे अपने विभाजित अंग (इंदिरा कांग्रेस) के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे, उनका एकमात्र लक्ष्य विरोधी दलों के साथ मिलकर इंदिरा कांग्रेस (Indira Congress) को उखाड़ फेंकना था।

इसलिए इंदिरा-शत्रुता ने विरोधी दलों को एक चुनाव संधि के लिए प्रोत्साहित किया और भारतीय राजनीति में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर विरोधी विचारधारा वाले दल एक मंच पर एकत्रित हुए। और कांग्रेस संगठन, स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी तथा भारतीय क्रांति दल ने मिलकर एक समझौता किया जिसे महामैत्री (ग्रैंड अलायंस) का नाम दिया गया।

साल 1971 में हुआ यह मध्यावधि चुनाव केवल इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व के चारों ओर घूमता हुआ दिखाई दिया। इस चुनाव में विरोधी दलों ने जो अभियान चलाया उसमें सबसे प्रमुख नारा “इंदिरा हटाओ” का था, जिससे इस बात का संकेत मिलता है कि विरोधी दल, नीतियों या सिद्धांतों के आधार पर नहीं, व्यक्तिगत वैमनस्य पर चुनाव लड़ रहे थे।

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बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियां कांग्रेस के लिए ज्यादा अनुकूल नहीं थी और यह अनुमान लगाना कठिन था कि इंदिरा कांग्रेस (Indira Congress) इस निर्वाचन में किस सीमा तक सफल हो सकेगी। लेकिन निर्वाचन परिणाम ने पूरे देश को ही नहीं विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया 1971 के चुनाव में इंदिरा कांग्रेस (Indira Congress) को 352 सीटें प्राप्त हुई।

जो कुल सीटों की 67.5 फ़ीसदी थी, 1967 के आम चुनाव के विपरीत चुनाव में कांग्रेस ने अपनी खोई हुई शक्ति पुनः प्राप्त कर ली, जबकि कांग्रेस का एक और सबल भाग इंदिरा कांग्रेस (Indira Congress) से अलग होकर विरोधी दलों के साथ था। इस चुनाव में कांग्रेस को 2/3 बहुमत प्राप्त हुआ और 1967 में विरोधी दलों की बढ़ती हुई संख्या एक बार फिर अपनी पिछली स्थिति में पहुंच गई।

पिछले आम चुनाव की तरह इस बार भी लोकसभा में कोई भी राजनीतिक दल इतनी संख्या में नहीं आ सका कि नियमित विरोधी दल का दर्जा प्राप्त कर सके। पिछले कई चुनाव की तरह इस बार भी साम्यवादी दल लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में वापस आया अन्य सभी विरोधी दलों को भारी क्षति उठानी पड़ी।

इंदिरा कांग्रेस (Indira Congress) को कुल मतों में से 43.78 फीसद मत प्राप्त हुए, जबकि 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस को केवल 40.8 फ़ीसदी मत प्राप्त हुए थे और यह मत अविभाजित कांग्रेस को मिले थे। सन 1971 के आम चुनाव में इंदिरा कांग्रेस को, जो पुरानी कांग्रेस से निकली नई संस्था थी, मतदाताओं का भारी समर्थन प्राप्त हुआ संक्षेप में कहे तो 1971 के मध्यावधि चुनाव के बाद भारत में एक दलीय आधिपत्य की पुनर्स्थापना हो गई और संगठित विरोधी दलों के विकास किया आशाएं समाप्त हो गई थी।

इस तरह से श्रीमती इंदिरा गांधी ने कांग्रेस की अंतर्कलह से निकलकर देश में ऐसी विजय हासिल की थी की पूर्व में कांग्रेस पार्टी का हिस्सा रहे कई प्रभावशाली नेता भी इस चुनाव में अपनी छाप छोड़ने में असफल साबित हुए और उनके द्वारा बनाए गए महामैत्री (ग्रैंड अलायंस) को इस चुनाव में मुंहकी खानी पड़ी।

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