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पिता से बगावत कर राजनीति में आई, चार बार यू पी की CM बनी लड़की, बनना चाहती थी कलेक्टर

देश की राजधानी में 15 जनवरी 1956 को दिल्ली के लेडी हार्डिंग अस्पताल में एक लड़की का जन्म हुआ । 15 दिन बाद उसकी मां से एक साधु ने कहा- ‘ये बहुत बड़ी नेता बनेगी।’

उसी दौरान बच्ची के पिता की नौकरी में पदोन्नति हुई । माता-पिता को लगा कि ये बच्ची की माया की वजह से हुआ है। जिससे माता-पिता ने उस लड़की का नाम ‘मायावती’ (Mayawati) रखा !

साल 1975 में ग्रेजुएशन करने के बाद, मायावती (Mayawati) ने BEd का कोर्स किया। फिर वकालत करने के लिए वो दिल्ली यूनिवर्सिटी पहुंच गईं, लेकिन मायावती का सपना UPSC की परीक्षा पास करके कलेक्टर बनना था।

अध्यापन और वकालत का कोर्स तो उन्होंने बैकअप के लिए रखा था, ताकि IAS नहीं बनीं, तो भी जीविकोपार्जन कर सके । तकरीबन एक वर्ष बाद मायावती (Mayawati) स्कूल टीचर बन गईं।

मायावती (Mayawati) का पहला भाषण जिससे उनको सियासत में पहचान मिली

मायावती की जीवनी लिखने वाले अजय बोस अपनी किताब ‘बहनजी’ में लिखते हैं- ‘1977 की बात है। जनता पार्टी ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में एक बैठक रखी थी। जिसमें बतौर वक्ता मायावती (Mayawati) भी पहुंचीं थी।

उत्तर प्रदेश के रायबरेली से इंदिरा गांधी को चुनाव हरा चुके राज नारायण ने अपने भाषण में कई बार दलितों के लिए ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग किया।

जब मायावती (Mayawati) मंच पर आईं, तो उन्होंने कहा- ‘हरिजन शब्द अपमानजनक है। सरकार के एक मंत्री ने इस शब्द को बार-बार दोहराकर दलितों का अपमान किया है। यह सम्मेलन, जो जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए किया गया है, वह एक मजाक मात्र बनकर रह गया है’

महज़ 20 साल की इस लड़की के भाषण ने वहां मौजूद दलितों में बिजली सी दौड़ा दी। राज नारायण हटाओ, जनता पार्टी हटाओ…के नारे पूरी सभा में गुंजायमान होने लगे।

तब कांशीराम उत्तर प्रदेश में दलितों के शीर्ष नेता के रूप में पहचान बना चुके थे। वे ऑल इंडिया बैकवर्ड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉइज फेडरेशन यानि बामसेफ की नींव रख चुके थे।

बामसेफ दलित, पिछड़े और मुस्लिम वर्ग के सरकारी कर्मचारियों का संगठन था। मायावती (Mayawati) का भाषण कार्यकर्ताओं के जरिए कांशीराम तक पहुंच गया था

कांशीराम उन दिनों पढ़े-लिखे दलितों को संगठन से जोड़ने की मुहिम चला रहे थे। उनका कहना था- ‘जब तक दलितों के दिमाग में दूसरी पार्टियों का कब्जा होगा, तब तक उनके घर हरवाहा पैदा होंगे, अगर दलितों के दिमाग में उनकी पार्टी का कब्जा होगा, तो उनके घर हाकिम पैदा होंगे।’

कांशीराम बोले- तुम्हारे आगे कलेक्टरों की लाइन लगा दूंगा

साल 1977 में जाड़े का मौसम, रात करीब 9 बजे का वक्त। हर दिन की तरह मायावती (Mayawati) रात का खाना खाने के बाद पढ़ने बैठ गईं। उनके माता-पिता और भाई-बहन सोने की तैयारी कर रहे थे। इस दरमियान किसी ने उनका दरवाजा खटखटाया। मायावती (Mayawati) ने दरवाजा खोला, तो देखा कि एक अधेड़ उम्र का शख्स, जिसके सिर पर ना के बराबर बाल थे और गले में मफलर लपेटे हुए दरवाजे पर खड़ा था

यह कोई और नहीं उस दौर के उभरते हुए दलितचिंतक कांशीराम थे। कांशीराम ने घर में प्रवेश किया और बैठ गये, कांशीराम ने मेज पर चारों तरफ फैली पुस्तकों की तरफ इशारा करते हुए मायावती से पूछा- ‘इतना पढ़-लिखकर क्या बनना चाहती हो?’

मायावती (Mayawati) ने जवाब दिया- ‘मैं कलेक्टर बनकर अपने समाज की सेवा करना चाहती हूं।’

उसी समय पीछे से उनके पिता प्रभुदास बोल पड़े- ‘मैं चाहता हूं कि मेरी बेटी अफसर बनकर दलित समुदाय का गौरव बने और दलितों के हित में अपना योगदान दें।’

कांशीराम ने मायावती (Mayawati) से कहा- ‘तुम बहुत बड़ी गलती कर रही हो। हमारे समुदाय ने कई कलेक्टरों और अफसरों को जन्म दिया है, लेकिन हम ढंग के लीडर नहीं ला सके, जो इन कलेक्टरों और अफसरों को सही रास्ता दिखा सके। मैं तुम्हें इतना बड़ा नेता बनाऊंगा कि तुम्हारे सामने कलेक्टरों की लाइन लग जाएगी।’ कांशीराम के ये अल्फाज़ मायावती समेत उनके पिता को अतिशयोक्ति ही लगे!

पिता का घर छोड़ जब कांशीराम के साथ रहने लगीं मायावती

कांशीराम से मुलाकात के बाद मायावती का ऐसा हृदय परिवर्तन हुआ कि उन्होंने UPSC की तैयारी करना छोड़ दिया और बामसेफ के कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने लगीं। हालांकि, मायावती के पिता प्रभुदास नहीं चाहते थे कि बेटी राजनीति में उतरे, उनकी राय भिन्न थी!

उन्होंने मायावती से कहा- ‘अगर तुमने राजनीति में जाने का ठान ही लिया है, तो कांग्रेस जैसी मजबूत पार्टी में जाओ, जहाँ से तुम कुछ अच्छा कर सकती हो! कांशीराम के चक्कर में तो तुम कॉर्पोरेटर भी नहीं बन पाओगी!

मायावती धीरे-धीरे पिता की बातों को नजरअंदाज करने लगी, वो हर छोटा-बड़ा फैसला कांशीराम से पूछकर लेने लगी थीं।

एक दिन गुस्से में पिता प्रभुदास ने मायावती से कहा- तुमने मेरी बात नहीं मानी और कांशीराम का साथ नहीं छोड़ा, तो मैं तुम्हें घर से निकाल दूंगा!

प्रभुदास को लगता था कि मायावती अविवाहित होने के चलते घर छोड़ने का फैसला नहीं करेगी, लेकिन उनका अंदाजा गलत निकला। उसी दिन मायावती बिना कुछ कहे अपनी तनख्वाह से बचाए पैसे और कुछ कपड़े लेकर घर से निकल गईं!

उस रोज कांशीराम शहर में नहीं थे, मायावती को समझ नहीं आ रहा था कि कहां जाएं! फिर वह करोलबाग स्थित बामसेफ के दफ्तर गईं, कांशीराम लौटकर आए तो मायावती ने उन्हें पूरी कहानी बताई।

कांशीराम किराए के एक कमरे में रहते थे, उन्होंने मायावती से कहा- ‘तुम मेरे कमरे में ठहर जाओ, मैं तो काम की वजह से ज्यादातर समय बाहर ही रहता हूं।’

इसके बाद मायावती कांशीराम के कमरे में रहने लगीं, बाद में कांशीराम पर मायावती को आगे कर सीनियर नेताओं की अनदेखी के आरोप भी लगने लगे।

अजय बोस लिखते हैं- ‘एक बार दिल्ली में कांशीराम के कमरे के बाहर मीडिया इकट्ठी थी। कुछ पत्रकारों ने बाग में एक रस्सी पर महिला के कपड़े सूखते हुए देखे! जिसको लेकर पत्रकारों ने सवाल किया कि आपके घर में महिला के कपड़े क्यों दिख रहे? इसको सुनकर कांशीराम बहुत नाराज हो गए थे।

BSP की स्थापना और सवर्णो पर निशाना

साल 1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी यानि BSP की नींव रखी! इसी साल मायावती अध्यापक की नौकरी छोड़ BSP की पूर्णकालिक सदस्य बन गईं, तब BSP के लोगों ने नारे लगाए ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’; ‘ठाकुर ब्राह्मण बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएस फोर।’ डीएस 4 से आशय यानि दलित, शोषित, समाज, संघर्ष, समिति।

कांशीराम कहते थे- ‘पहला चुनाव हारने के लिए दूसरा चुनाव हरवाने के लिए और तीसरा चुनाव जीतने के लिए लड़ेंगे।’

मायावती ने साइकिल से किया चुनाव प्रचार

सन् 1984 में मायावती कैराना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ीं,वे साइकिल पर बैठकर चुनाव प्रचार करती थीं। हालांकि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस लहर में मायावती को पराजय झेलनी पड़ी, और उनकी पार्टी भी कोई सीट नहीं जीत पाई!

साल 1985 में बिजनौर और 1987 में मायावती ने हरिद्वार से लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन एक बार फिर से उनको हार झेलनी पड़ी, उस वक्त हरिद्वार उत्तर प्रदेश का हिस्सा था।

जब पहली बार बिजनौर से लोकसभा चुनाव जीती मायावती

साल 1989 मायावती और BSP दोनों के लिए खास रहा। इस साल लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नवंबर-दिसंबर महीने में हुए। केंद्र की राजीव गांधी सरकार बोफोर्स घोटाले से घिरी थी, उसका असर उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर भी हो रहा था, मायावती बिजनौर लोकसभा से चुनाव लड़ीं और 8 हजार वोटों से जीत हासिल की, 13 सीटों पर जीत के साथ BSP राज्य में चौथे नंबर की पार्टी बनी!

वर्ष 1991 में मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से चुनाव हुए, तब भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी रथयात्रा निकाल चुके थे और अयोध्या में गोलीकांड हो चुका था, इसका फायदा भाजपा को मिला और उसने 419 में से 221 सीटों पर जीत हासिल की और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने !

अयोध्या गोली कांड की वजह से मुसलमान कांग्रेस से छिटककर समाजवादी पार्टी की तरफ शिफ्ट होने लगे थे,उसी दौरान एक साक्षात्कार में कांशीराम ने कहा- ‘यदि मुलायम सिंह उनसे हाथ मिला लें, तो उत्तर प्रदेश से अन्य पार्टियों का सूपड़ा साफ हो जाएगा!

इसके बाद मुलायम सिंह ने कांशीराम से दिल्ली में मुलाकात की और उनकी सलाह पर अक्टूबर 1992 में समाजवादी पार्टी यानि समाजवादी पार्टी का गठन किया, लगभग दो महीने के पश्चात 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहा दिए जाने के बाद केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया!

वर्ष 1993 में सपा और बसपा ने एकसाथ मिलकर चुनाव लड़ा और सियासी गलियारो में नारा उछाला गया- ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ उस चुनाव में सपा को 109 और BSP को 67 सीटों पर जीत मिली, मुलायम सिंह दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हालांकि कुछ समय बाद ही सपा और बसपा के बीच अनबन की खबरें सामने आने लगीं और गठबंधन टूट गया!

बीमार कांशीराम ने मायावती से पूछा- मुख्यमंत्री बनोगी?

यह 23 मई 1995 की बात है जब कांशीराम अस्पताल में भर्ती थे। तभी भाजपा नेता लालजी टंडन से उनकी फोन पर वार्ता हुई, इसके बाद उन्होंने मायावती को बुलाया और पूछा कि तुम मुख्यमंत्री बनोगी?

मायावती को लगा कि बीमार कांशीराम उनसे मजाक कर रहे हैं। फिर उन्होंने दूसरे दलों के समर्थन के पत्र दिखाए और कहा कि तुम लखनऊ जाकर ये दस्तावेज राज्यपाल को सौंपना वह तुमको मुख्यमंत्री बना देंगे,

1 जून 1995, मायावती ने राज्यपाल से मुलाकात की और सपा से अलग होकर BJP के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।

लखनऊ का गेस्ट हाउस कांड, बाल-बाल बचीं मायावती

2 जून 1995, मायावती, लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में विधायकों के साथ बैठक कर रही थीं। दोपहर करीब तीन बजे समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की भीड़ ने गेस्ट हाउस पर हमला बोल दिया। सपा कार्यकर्ताओं का कहना था कि मायावती (Mayawati) ने धोखा दिया है।

अजय बोस की किताब ‘बहनजी’ के मुताबिक उस रोज मुलायम समर्थकों ने मायावती (Mayawati) को कमरे में बंद करके मारा और उनके कपड़े फाड़ दिए। किसी तरह मायावती खुद को एक कमरे में बंद करने में सफल रहीं। सपा समर्थक लगातार दरवाजा तोड़ने की कोशिश करते रहे।

इसी बीच BJP विधायक और RSS से जुड़े रहे ब्रह्मदत्त द्विवेदी मौके पर पहुंचे और सपा समर्थकों को पीछे धकेला। तब से मायावती उन्हें अपना भाई मानने लगीं और कभी उनके खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया। फर्रुखाबाद में तो वो ब्रह्मदत्त के लिए प्रचार करने भी जाती थीं।

कहा जाता है कि जब ब्रह्मदत्त की हत्या हुई, तब मायावती (Mayawati) उनके घर गईं और फूट-फूट कर रोईं। उनकी पत्नी ने जब चुनाव लड़ा, तो मायावती ने लोगों से कहा- ‘मेरी जान बचाने के लिए दुश्मनी मोल लेकर शहीद होने वाले मेरे भाई की विधवा को वोट दें।’

BJP के समर्थन से मायावती देश की पहली दलित मुख्यमंत्री बनीं

3 जून 1995, BJP, कांग्रेस, जनता दल और कम्युनिस्ट पार्टी के 282 विधायकों के समर्थन से मायावती (Mayawati) UP की मुख्यमंत्री बनीं। वो भारत की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनी थीं।

अजय बोस अपनी किताब ‘बहनजी’ में लिखते हैं- ‘तत्कालीन PM पीवी नरसिम्हाराव को जब पता चला कि मायावती (Mayawati) UP की मुख्यमंत्री बनीं हैं, तो उनका पहला रिएक्शन था- ‘यह लोकतंत्र का चमत्कार है।’ हालांकि, 5 महीने बाद ही BJP और BSP का गठबंधन बिखर गया।

भाजपा-बसपा के बीच 6-6 महीने की डील में बनी मुख्यमंत्री, भाजपा की बारी में मुकर गयी माया

साल 1996 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, 174 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, सपा को 110 और बसपा को 67 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को 19 सीटें मिली, भाजपा का मुलायम के साथ जाना मुमकिन नहीं था और स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती (Mayawati) और मुलायम का मिलना नामुमकिन सा हो गया था, ऐसे में राज्य में फिर से राष्ट्रपति शासन लग गया!

तकरीबन एक साल बाद भाजपा और बसपा फिर से गठबंधन की पटरी पर लौटे, दोनों के बीच 6-6 महीने मुख्यमंत्री का फॉर्मूला तय हुआ ,

अप्रैल 1997 में मायावती (Mayawati) दूसरी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन 6 महीने बाद जब BJP के कल्याण सिंह को कमान सौंपने की बारी आई, तो मायावती ने यह कहते हुए समर्थन वापस ले लिया कि वे दलित विरोधी हैं हम उनको उत्तर प्रदेश की सत्ता नहीं सौंप सकते ।

इसके बाद 2002 में भी भाजपा ने समर्थन देकर मायावती (Mayawati) को मुख्यमंत्री बनवाया, कहा जाता है कि संघ ने भाजपा को सलाह दी थी कि मायावती (Mayawati) मुख्यमंत्री बनेंगी, तो दलित वोट कांग्रेस से छिटक कर बसपा की तरफ शिफ्ट हो जाएगा, हालांकि एक वर्ष बाद ही भाजपा ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी और मुलायम सिंह को समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवा दिया था।

जब सर्वजन हिताय के श्लोगन से आखिरी बार सत्ता में लौटी मायावती

साल 2007 में उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से चुनावी रणभेरी बजी, तब मुलायम का साथ देने की वजह से सवर्ण, भाजपा से नाराज थे, दूसरी तरफ भाजपा से समर्थन लेने की वजह से मुस्लिम मुलायम से नाराज थे,

इस बात का भान मायावती (Mayawati) को बखूबी था, वह तब तक वह ये भी समझ चुकी थी कि अपने दम पर सरकार बनानी है, तो सिर्फ दलितों के वोट से काम नहीं चलेगा। उन्होंने कांग्रेस के पुराने सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित कॉम्बिनेशन के फॉर्मूले को अपनाया ! अंतर बस इतना था कि कांग्रेस के फॉर्मूले में ब्राह्मण मेजबानी करते थे और मायावती (Mayawati) के फॉर्मूले में दलितों की तरफ से ब्राह्मणों और मुस्लिमों को दावत दी गई।

मायावती (Mayawati) ने कांशीराम के बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की जगह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का नारा दिया। जगह-जगह पोस्टर लग गए- ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी चलता जाएगा… हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है।’ राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि इस श्लोगन की वजह से ही मायावती (Mayawati) ने 403 सीटों में से 206 सीटें जीती और इनमें 45 से ज्यादा विधायक ब्राह्मण थे, उन्होंने अपनी कैबिनेट में भी 10 ब्राह्मणों को जगह दी थी !

लेकिन इसके बाद केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने किसानों के लोन माफ किए, फिर कभी मायावती खड़ी नहीं हो पाई,अपने दम पर उत्तर प्रदेश जीतने के बाद मायावती (Mayawati) की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थी। उनके समर्थक नारा लगाते थे, ‘लखनऊ जीत लिया, अब दिल्ली की बारी है।’

इसी बीच कांग्रेस ने 2009 लोकसभा चुनाव से पहले किसानों के 60 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्ज माफ कर दिए। इससे पहले सरकार 100 दिनों के रोजगार की गारंटी के लिए मनरेगा जैसी योजना लागू कर चुकी थी। इससे कांग्रेस को UP के साथ-साथ देशभर में फायदा हुआ। 206 सीटें जीतकर कांग्रेस देश में सबसे बड़ी पार्टी बनी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 9 सीटों से 21 पर पहुंच गई और उसका वोट शेयर भी 6% बढ़ गया, जबकि मायावती (Mayawati) 20 सीटें ही जीत पाईं, कहा जाता है कि मायावती (Mayawati) को उम्मीद थी कि वो 40-50 सीटें जीतती हैं, तो PM बनने की शर्तों पर UPA या NDA से डील कर पाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

2012 के विधानसभा चुनाव में मायावती (Mayawati) के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी का माहौल था। उन पर करप्शन के आरोप लग रहे थे। लिहाजा बसपा 206 से घटकर 80 सीटों पर सिमट गई और सपा ने 403 में से 224 सीटें जीत लीं। उसके बाद से मायावती फिर कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापस नहीं लौट पाई और तब से लेकर आज तक मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सत्ता में वापसी की राह तलाश रही है ।

4 बार यूपी की CM रही, दलितों की नेता और बसपा की महासचिव मायावती (Mayawati) की जिन्दगी के अनछुए पहलू! – Tweet This?

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