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संसद की शक्तियां

संसद (Parliament) की क्या-क्या शक्तियां होती हैं?

आज हम अपने इस विशेष अंक में बात करेंगे देश के सर्वोच्च विधायिनी संस्था (संसद Parliament) की शक्तियों के बारे में –

भारत का संविधान कुछ बातों को छोड़कर संसद के दोनों सदनों को समान अधिकार देता है, संसद देश की सर्वोच्च विधायिनी संस्था है जिसे अपने निर्धारित क्षेत्र में कानून बनाने का अधिकार है, संविधान में केंद्र तथा राज्य सरकारों की शक्तियों का वितरण कर दिया गया है।

किन विषयों पर संसद और किन विषयों पर राज्य विधानमंडल कानून बना सकते हैं इसका उल्लेख क्रमशः संघ सूची तथा राज्य सूची में किया गया है, समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार संसद (Parliament) तथा राज्य विधान मंडल दोनों को प्राप्त है।

लेकिन व्यवस्था यह है केंद्र सरकार और राज्य विधान मंडलों दोनों समवर्ती सूची में दिए गए विषयों में से किसी विषय पर कानून बनाते हैं तो संसद द्वारा बनाया गया कानून मान्य होगा और राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित किया गया कानून अमान्य समझा जाएगा, इसका अर्थ यह है कि व्यावहारिक रूप से समवर्ती सूची में दिए गए विषयों पर संसद (Parliament) का अधिकार राज्यों की अपेक्षा ज्यादा विस्तृत और प्रभावी है।

यही नहीं कुछ परिस्थितियों में संसद को राज्य सूची में दिए गए विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है, संविधान के उपर्युक्त प्रावधानों का व्यावहारिक परिणाम यह है कि भारतीय संसद (Parliament) विस्तृत विधायिनी अधिकार रखती है, संविधान द्वारा केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का जो वितरण किया गया है उसमें भी केंद्रीय विधानमंडल को अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न किया गया है।

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भारतीय संविधान ने संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना की है जिसकी प्रमुख विशेषता कार्यकारिणी का विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होना है, संविधान का अनुच्छेद 75(3) यह घोषणा करता है मंत्रिमंडल लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगा, कार्यकारिणी का विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होने का अर्थ यह है कि विधान मंडल को कार्यकारिणी के कृत्यों पर नियंत्रण रखने का अधिकार है, विधानमंडल यह नियंत्रण विभिन्न संसदीय उपकरणों के द्वारा करता है।

भारत के संविधान के अनुसार मंत्रिमंडल केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है राज्यसभा के प्रति नहीं इसीलिए लोकसभा को यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी भी समय मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित करके उसे विघटित करा दे, एक संसदीय शासन प्रणाली में विधान मंडल अप्रत्यक्ष रूप से भी मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास प्रकट कर सकता है।

संसद की शक्तियां

उदाहरण के लिए यदि मंत्रिमंडल द्वारा प्रस्तुत किया गया कोई विधेयक लोकसभा द्वारा रद्द कर दिया जाए तो उसे मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास समझा जाता है और ऐसी दशा में मंत्रिमंडल त्यागपत्र दे देता है, इस प्रकार के कई और भी तरीके हैं जिनके माध्यम से लोकसभा मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास व्यक्त करके उसका अंत करा सकती है।

व्यवहारिक रूप से संसद (Parliament) की अपेक्षा मंत्रिमंडल अधिक शक्तिशाली होता है और जब तक लोकसभा में मंत्रिमंडल को बहुमत प्राप्त रहता है उसके विरुद्ध अविश्वास के प्रस्ताव पारित होने की संभावना नहीं रहती।

संघीय वित्त पर संसद का पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया गया है संविधान के अनुसार “विधि के अधिकार” के बिना ना तो कोई कर लगाया जा सकता है और ना कोई व्यय किया जा सकता है, प्रत्येक वर्ष कार्यकारिणी संसद (Parliament) के समक्ष बजट प्रस्तुत करती है इसमें आगामी वित्तीय वर्ष के लिए प्रस्तावित करों तथा व्यय का ब्योरा होता है, संसद द्वारा इस बजट की स्वीकृति हो जाने के बाद ही सरकार धन की वसूली और खर्च कर सकती है।

विधायिनी, कार्यकारिणी तथा वित्तीय शक्तियों के अतिरिक्त भारतीय संसद को कुछ और भी अधिकार दिए गए हैं संसद के दोनों सदनों को राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का अधिकार प्राप्त है और उन्हें हटाने का अधिकार भी केवल संसद को ही दिया गया है।

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इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पद्च्युत करने का प्रस्ताव पहले संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाना आवश्यक होता है अर्थात संसद (Parliament) की इच्छा के बिना न्यायाधीशों को उनके पद से नहीं हटाया जा सकता।

संविधान में संशोधन करने का मूल्यवान अधिकार संसद को प्राप्त है संशोधन- प्रस्ताव पहले संसद द्वारा पारित किया जाना आवश्यक है सांविधानिक संशोधनों में पहल करने का अधिकार राज्य को नहीं दिया गया है, यही नहीं संविधान के बड़े भाग में संशोधन करने का अधिकार एकमात्र संसद को दिया गया है।

ऐसे अनुच्छेद कम ही हैं जिनमें संशोधन के लिए राज्य विधानमंडलों का अनुमोदन आवश्यक होता है संविधान की 24वें तथा 42वें संशोधनों ने संसद की संशोधन करने की शक्तियों को अत्यधिक विस्तृत करने का प्रयास किया है।

राष्ट्रपति के द्वारा की गई आपात की घोषणा का संसद (Parliament) के द्वारा अनुमोदन किया जाना आवश्यक है अन्यथा यह उद्घोषणा एक निश्चित अवधि से ज्यादा लागू नहीं रह सकती है।

देश के संघीय स्वरूप को निश्चित करने में संसद अग्रणी भूमिका अदा करती है, संविधान के अनुसार, संसद (Parliament) एक कानून बनाकर नए राज्यों का निर्माण तथा राज्यों के नाम और सीमाओं में भी परिवर्तन कर सकती है।

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