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मोदी पर नहीं चला सहयोगी दलों का दबाव

लोकसभा चुनाव 2024 में जहां एक तरफ भाजपा को अकेले दम पर 240 तो वहीं एनडीए (NDA) के अन्य घटक दलों को मिलाकर कुल 293 सीटें हासिल हुई, जो कि सरकार गठन के लिए आवश्यकता से 21 अधिक थी किंतु ऐसी स्थिति में यह देखा जा रहा था कि भाजपा अकेले दम पर सिर्फ 240 सीटें ही हासिल कर पाई है।

NDA के सहयोगी दलों का दबाव मोदी पर नहीं चल पाया 

तो ऐसे में सहयोगी दलों की क्या भूमिका होगी और सहयोगी दलों की क्या मांगे होंगी, क्या इन मांगों के आगे भाजपा नेतृत्व और मोदी (Modi) को झुकना होगा।

किंतु एनडीए (NDA) में ऐसा कुछ भी नहीं देखने को मिला है 9 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) समेत 72 मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली, जिनमें से अधिकांश भाजपा के बड़े नेता जो पिछली सरकार का भी हिस्सा रहे हैं वह शामिल रहे ! एनडीए (NDA) कि इस सरकार में किंग मेकर की भूमिका में तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) रही।

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तेलुगु देशम पार्टी ने जहां एक तरफ बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 16 सीटों पर तो वही जनता दल (यूनाइटेड) ने भी 12 सीटों पर जीत दर्ज की। माना जा रहा था कि टीडीपी और जेडी(यू) के दबाव को मोदी और भाजपा को झेलना पड़ेगा, किंतु भाजपा ने अपने सहयोगियों को भी मंत्रिमंडल में स्थान देकर निर्वाध रूप से साध लिया और कोई भी सहयोगी दल छिटकने और अपनी ओर से अधिक मांगों को रखने की स्थिति में नहीं दिखा।

विदित हो कि बिहार की सियासत में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले नीतीश कुमार के साथ ही बिहार से ही ताल्लुक रखने वाले चिराग पासवान और जीतन राम मांझी भी मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं ऐसे में नीतीश कुमार भी अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि भाजपा पर प्रेशर पॉलिटिक्स अधिक नहीं चलेगी बात करें अगर चिराग पासवान की तो उन्होंने 5 सीटों पर चुनाव लड़कर पांचो में जीत हासिल की है तू वही जीतन राम मांझी भी गया कि सुरक्षित सीट से जीत कर दिल्ली पहुंचे हैं।

तो वहीं एनडीए (NDA) के दूसरे घटक दल तेलुगु देशम पार्टी के मुखिया एन. चंद्रबाबू नायडू भी अरसे बाद आंध्र प्रदेश की सत्ता में वापसी कर पाये हैं और उनको लगता है कि भाजपा के बिना वह भी कमजोर हो जाएंगे इसलिए वह केंद्र की मोदी सरकार (Modi Government) में कुछ विशेष दखल या अतिरिक्त मांगों को लेकर नहीं मुखर हो रहे हैं।

भविष्य में बढ़ सकता है एनडीए (NDA) का कुनबा

वर्तमान राजनीतिक हालात इस प्रकार से बन रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में तीसरी बार देश में एनडीए (NDA) सरकार बन चुकी है विपक्ष की राजनीति में कई सक्रिय क्षेत्रीय राजनीतिक दल जिनकी विचारधारा भिन्न है लेकिन परिवर्तित परिस्थितियों में उनके लिए पाला बदलना मुश्किल नहीं होगा।

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कई राज्यों में हमने देखा है कि बीते लोकसभा चुनाव में दिल्ली में इंडिया ब्लॉक का हिस्सा हैं लेकिन अपने-अपने राज्यों में एक-दूसरे के सामने चुनाव मैदान में थी।

जैसे कि पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस प्रतिद्वंदी के रूप में चुनाव में थी।

किंतु यह सब दल अब फिर से इंडिया ब्लॉक का हिस्सा हैं और एनडीए (NDA) के खिलाफ भारतीय राजनीति में बतौर विपक्षी दल अपना रोल अदा कर रहे हैं। किंतु आज की राजनीति की सच्चाई वैचारिकी से पृथक नजर आती है और समय-समय पर हमने देखा है कि वैचारिक रूप से धुर विरोधी राजनीतिक दल भी एक हो गए हैं।

मौजूदा समय में यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि कोई भी विपरीत विचारधारा की पार्टी दूसरी पार्टी से मेल अथवा गठबंधन कर ले, यह परिवर्तन अगर एनडीए (NDA) के पक्ष में होता है तो निश्चित रूप से एनडीए (NDA) का कुनबा बढ़ना तय है।

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