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लोकसभा तथा राज्यसभा के मध्य सम्बंध

देश की संसद के दो सदन हैं राज्यसभा (उच्च सदन) लोकसभा (निम्न सदन) आज हम लोकसभा और राज्यसभा के अधिकार और दोनों सदनों के परस्पर संबंधों के बारे में विस्तृत बात करेंगे !

भारत का संविधान संसद के दोनों सदनों को विधि निर्माण का अधिकार देता है, लेकिन राज्यसभा (Rajya Sabha) की शक्तियां लोकसभा (LokSabha) की तुलना में अत्यधिक सीमित हैं, इसमें संदेह नहीं है कि कोई भी साधारण विधेयक किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है और कोई भी बिल चाहे वह धन विधेयक हो या साधारण विधेयक, उस समय तक कानून का रूप नहीं प्राप्त कर सकता, जब तक वह दोनों सदनों से पारित न किया गया हो।

लेकिन धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, साधारण विधेयक किसी भी सदन में पुनः स्थापित किये जा सकते हैं लेकिन कोई भी सदन साधारण विधेयक को 6 महीने से ज्यादा नहीं रोक सकता।

लोकसभा (LokSabha) तथा राज्यसभा (Rajya Sabha) के मध्य सम्बंध

व्यवस्था यह है कि यदि दोनों सदनों के बीच साधारण विधेयकों के संबंध में कोई गतिरोध हो तो उनकी संयुक्त बैठक बुलाई जाएगी और उसमें अंतिम निर्णय लिया जाएगा इसका अर्थ यह है कि साधारण विधेयकों के संबंध में संविधान दोनों सदनों को समान अधिकार देता है।

लेकिन व्यावहारिक रूप से साधारण विधेयक के संबंध में भी लोकसभा (LokSabha) के अधिकार अधिक हैं, कारण यह है कि किसी बिल के संबंध में दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न होने पर दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है।

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जिसमें साधारण बहुमत से निर्णय लिया जाता है और यह अधिकांशतः लोकसभा के ही पक्ष में होता है क्योंकि लोकसभा की सदस्य संख्या राज्यसभा की सदस्य संख्या से लगभग दो गुनी है, इसका अर्थ यह हुआ कि साधारण विधेयकों के संबंध में भी लोकसभा (LokSabha) का निर्णय अंतिम होगा ! इस प्रकार संविधान स्पष्ट रूप से राज्यसभा (Rajya Sabha) की तुलना में लोकसभा को उच्च स्थान प्रदान करता है और राज्यसभा निसंदेह एक कमजोर संस्था है।

जहां तक कार्यकारिणी पर नियंत्रण रखने का सम्बंध है, राज्यसभा की शक्तियां लोकसभा के मुकाबले में सीमित हैं संविधान के अनुसार मंत्रिमंडल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है अतः यह केवल लोकसभा (LokSabha) का विशेषाधिकार है कि वह मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास व्यक्त करके समय से पूर्व उसे विघटित करा दें।

यद्यपि राज्यसभा को प्रश्न पूछने का अधिकार है और मंत्रीगण प्रश्नों के उत्तर देने के लिए राज्यसभा में जाते हैं लेकिन राज्यसभा में मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है, इसका अर्थ यह है कि राज्यसभा, लोकसभा के सामान ही सरकार की आलोचना करने का अधिकार रखती है लेकिन उसे मंत्रिमंडल को अपदस्थ करने का अधिकार नहीं है।

इससे राज्यसभा की स्थिति लोकसभा की तुलना में कमजोर हो जाती है संविधान बनाने वालों का उद्देश्य भी लोकसभा की सर्वोच्चता को स्थापित करना था।

मंत्रियों की नियुक्ति राज्यसभा के सदस्यों में से भी की जा सकती है क्योंकि संविधान के अनुसार शर्त केवल यह है कि प्रधानमंत्री अथवा मंत्रियों को संसद के किसी भी सदन का सदस्य होना चाहिए।

साल 1966 में पहली बार राज्यसभा की एक सदस्या श्रीमती इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया था। विभिन्न राज्यों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जब मुख्यमंत्री का चयन निम्न सदन के बजाय उच्च सदन से किया गया है।

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उदाहरण के लिए मद्रास में साल 1952 में विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य राजगोपालाचारी को मद्रास का मुख्यमंत्री बनाया गया था! साल 1952 के चुनाव के बाद मुंबई में मोरारजी देसाई को मुख्यमंत्री बनाया गया जो उच्च सदन के सदस्य थे! साल 1961 में उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के एक सदस्य सी० वी० गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया गया था।

लोकसभा की तुलना में राज्यसभा (Rajya Sabha) की शक्तियां कम हैं और यह अपेक्षाकृत अनुपयोगी सदन प्रतीत होता है, लेकिन राज्यसभा को कुछ ऐसी शक्तियां प्राप्त है जो लोकसभा (LokSabha) के पास नहीं है- उदाहरण के लिए संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार राज्यसभा राज्य सूची में दिए गए किसी विषय को राष्ट्रीय महत्व का विषय घोषित करके उस पर संसद को कानून बनाने का अधिकार प्रदान कर सकती है।

इसी प्रकार अनुच्छेद 312 राज्यसभा को अधिकार देता है कि वह किसी भी अखिल भारतीय सेवा की स्थापना के लिए प्रस्ताव पारित कर सकती है, उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि सैद्धांतिक रूप से अनेक देशों के समान भारत में भी संसद का उच्च सदन निम्न सदन की तुलना में कम महत्व रखता है।

लेकिन वास्तव में इन दोनों सदनों के सम्बंध बहुत कुछ सदन में दलीय स्थिति पर निर्भर करते हैं, जब संसद के दोनों सदनों में एक ही राजनीतिक दल का बहुमत होगा तो उनके बीच किसी टकराव की संभावना कम होगी, लेकिन यदि ऐसी स्थिति आती है जब लोकसभा (LokSabha) में किसी अन्य दल का बहुमत हो राज्यसभा में किसी दूसरे दल का तो यह स्थिति कुछ खतरनाक हो सकती है।

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विशेषकर यदि लोकसभा (LokSabha) में बहुमत प्राप्त दल को सीमांत बहुमत प्राप्त है और राज्यसभा में उस दल का बहुमत है जो लोकसभा में अल्पमत में है तो ऐसी स्थिति में यदि किसी बिल को लेकर संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाएगा तो उसमें इस बात की संभावना हो सकती है कि विधायनी क्षेत्र में राज्यसभा लोकसभा पर प्रधानता प्राप्त कर ले, लेकिन ऐसी स्थिति विरले ही आ सकती है अतः यह बात अपनी जगह पर निश्चित है कि साधारण परिस्थितियों में राज्यसभा को लोकसभा के सामने झुकना पड़ेगा।

साल 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी ही बहुमत में थी इसका परिणाम क्या हुआ कि कई अवसरों पर लोकसभा (LokSabha) को राज्यसभा के दृष्टिकोण पर गंभीरता से विचार करना पड़ा, इसका ज्वलंत उदाहरण संविधान का 44वां संशोधन अधिनियम था! जिसमें राज्यसभा ने काफी संशोधन करने के बाद ही उसे पारित किया और लोकसभा को इस विधेयक के एक बड़े भाग को जिसे राज्यसभा (Rajya Sabha) ने अस्वीकार कर दिया था उसे अधिनियम से निकलना पड़ा।

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