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कांग्रेस-आधिपत्य की पुनर्स्थापना

वर्ष 1977 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाली जनता पार्टी की सरकार आपसी फूट के कारण लगभग 2 वर्ष और महज़ कुछ महीने ही जीवित रह सकी, इन 2 वर्षों में मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री हुए ! चरण सिंह ने सरकार बनने के तीन सप्ताह बाद ही त्यागपत्र दे दिया और राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने का परामर्श दिया , क्योंकि कोई अन्य दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं था इसलिए राष्ट्रपति ने 22 अगस्त सन 1979 को लोकसभा को भंग करने की घोषणा कर दी और जनवरी 1980 में सातवीं लोकसभा के चुनाव संपन्न हुए !
साल 1980 के चुनाव में लोकसभा के 542 सीटों का चुनाव होना था, लेकिन चुनाव 525 सीटों पर ही हुआ, दो सीटों पर निर्विरोध चुनाव हुआ, इस निर्वाचन में कांग्रेस सहित किसी भी राजनीतिक दल ने सभी सीटों पर चुनाव नहीं लड़ा कांग्रेस(आई) 491 और जनता पार्टी ने 431 सीटों के लिए ही उम्मीदवार खड़े किए !
वर्ष 1977 के चुनाव में बुरी तरह पराजित होने वाले दल इंदिरा कांग्रेस के बारे में यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि केवल 2 वर्षों के बाद ही वह पुनः सत्ता में आ जाएगी ! लेकिन हुआ यही साल 1980 के इस मध्यावधि चुनाव में जिन 527 सीटों के लिए चुनाव हुआ, उसमें कांग्रेस(आई) को 352 सीटें प्राप्त हुई जो कुल सीटों की लगभग 66.79 प्रतिशत थी !
वर्ष 1980 के चुनाव में कांग्रेस का दो तिहाई बहुमत से वापस आना एक प्रकार का राजनीतिक चमत्कार था, कांग्रेस की अप्रत्याशित विजय के दो मौलिक कारण बताए जा सकते हैं पहला- यह कि जनता सरकार का अत्यधिक निराशाजनक निष्पादन और दूसरा- श्रीमती इंदिरा गांधी का प्रभावशाली व्यक्तित्व !
अपने शासनकाल में ढाई वर्षो में जनता पार्टी ने विभिन्न तरीकों से श्रीमती गांधी की छवि बिगड़ने की कोशिश की उन्हें गिरफ्तार किया गया, शाह कमीशन का गठन किया गया और तरह-तरह की यातनाएं दी गई, श्रीमती गाँधी ने परिस्थितियों का दृढ़ता से मुकाबला किया इससे जनता की सहानुभूति श्रीमती गांधी के साथ हो गई !
साल 1980 के चुनाव में श्रीमती गांधी ने बड़े ही विश्वास और संयम के साथ चुनाव लड़ा, इतना व्यापक चुनाव अभियान शायद इससे पहले नहीं किया गया था ! श्रीमती गांधी ने 384 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा किया और रात-दिन मेहनत की, वास्तविकता यह है कि इस चुनाव में कांग्रेस की विजय, दल की जीत नहीं श्रीमती गांधी की व्यक्तिगत जीत भी कही जाती है, मतदाताओं ने सिद्धांत या आदर्श के नाम पर नहीं केवल श्रीमती गांधी के नाम पर वोट दिया था !
जनता पार्टी में विभाजन होने के फलस्वरूप पहले ही की तरह कांग्रेस विरोधी वोट फिर से एक बार गैर-कांग्रेसी दलों में विभाजित हो गए और इसका लाभ वास्तविक रूप से कांग्रेस को मिला अन्य कारणों के अतिरिक्त साल 1980 के चुनाव में कांग्रेस(आई) का दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर लेना श्रीमती गांधी के चमत्कारी नेतृत्व का प्रभाव था।

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