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जब इंदिरा सरकार पर भारी पड़ा “सम्पूर्ण क्रांति” का नारा, गँवानी पड़ी थी सत्ता

साल 1977 का लोकसभा का चुनाव अत्यधिक असाधारण परिस्थितियों में कराया गया और उसके परिणाम भी असाधारण महत्व के निकले यह चुनाव देश में उद्घोषित आपात स्थिति के ठीक बाद कराए गए, परिणामों की दृष्टि से इतना अधिक अनिश्चित चुनाव इससे पहले कोई भी नहीं हुआ था ! वर्ष 1977 में जिस राजनीतिक वातावरण में लोकसभा के चुनाव कराए गए उस वातावरण का प्रारंभ 1974 में जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए आंदोलन से हुआ और इसीलिए 1974 को ‘जयप्रकाश नारायण वर्ष’ कहा गया जयप्रकाश नारायण द्वारा बिहार में जो आंदोलन चलाया गया मुख्य रूप से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार और बढ़ती हुई महंगाई के खिलाफ था!
जयप्रकाश नारायण ने “सम्पूर्ण क्रांति” का नारा दिया और कर न देने, जिला अधिकारियों का घेराव करने तथा विद्यार्थियों से 1 वर्ष के लिए स्कूल कॉलेजों को छोड़कर इस आंदोलन में भाग लेने की अपील की, उन्होंने सेना से भी अपील की कि वह सरकार के ऐसे आदेशों का पालन न करें जो अनुचित तथा अवैधानिक हो 14 अक्टूबर 1974 को जयप्रकाश नारायण ने यह घोषणा की जल्द ही प्रशासकीय स्तरों पर समानांतर सरकारों की स्थापना की जाएगी, 14 अक्टूबर को जयप्रकाश नारायण ने पटना में एक रैली का नेतृत्व किया जिस पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया और जयप्रकाश नारायण को भी चोटें आई, भ्रष्टाचार के विरुद्ध आरंभ किए गए आंदोलन ने क्रांति का रूप धारण कर लिया और बिहार में लूटमार और उपद्रव का वातावरण उत्पन्न हो गया ! इंदिरा सरकार की ओर से जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की घोर आलोचना की गई और यह प्रचार किया गया कि आंदोलन के पीछे फासीवादी शक्तियां हैं जो जनतंत्र का अंत कर देना चाहती हैं !

जून 1975 में भारतीय राजनीति ने एक नया मोड़ लिया, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित करते हुए उन्हें 6 वर्षों के लिए किसी भी चुनाव से अनर्ह घोषित किया ! इस निर्णय के पश्चात विपक्षी दलों ने श्रीमती गांधी से त्यागपत्र देने की मांग की और राजनीतिक धमकी दी कि वह 29 जून से राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए आंदोलन चलाएंगे, इसी बीच श्रीमती गाँधी ने सर्वोच्च न्यायालय से उक्त निर्णय के विरुद्ध स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया! ऐसा कहा जाता है कि स्वयं कांग्रेस दल में भी कुछ वरिष्ठ नेता इस पक्ष में थे श्रीमती गांधी को त्यागपत्र दे देना चाहिए, इन राजनीतिक परिस्थितियों में 25 जून 1975 की रात्रि में देश में आंतरिक आपात की घोषणा पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए और 26 जून को प्रातः से देश में आंतरिक संकट की घोषणा कर दी गई ! इसके तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण सहित विपक्ष के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, आपात स्थिति की घोषणा के साथ ही पूरे देश में बड़े स्तर पर उन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया जो इंदिरा कांग्रेस के विरोधी अथवा आलोचक थे, प्रेस पर पूर्ण सेंसर लगा दिया गया, नागरिक स्वतंत्रताओं को स्थगित कर दिया गया, श्रीमती गांधी ने दमन की राजनीति द्वारा देश में प्राप्त राजनीतिक असंतोष को सामूहिक रूप से कुचल दिया ! लेकिन आंतरिक रूप से जनसाधारण में कांग्रेस सरकार के विरुद्ध घृणा बढ़ती रही ! फरवरी 1976 में लोकसभा ने अपना कार्यकाल मार्च 1977 तक बढ़ाने का प्रस्ताव पारित किया ! तमिलनाडु, गुजरात और उड़ीसा के संवैधानिक सरकारों को स्थगित अथवा भंग कर राष्ट्रपति शासन स्थापित किया गया !
समस्त विपक्ष के नेताओं के जेल में बंद किए जाने और ‘मीसा’ तथा डी आई आर का अधिकतम प्रयोग करके श्रीमती गांधी ने अपना पूर्ण प्रभुत्व स्थापित कर लिया और पूरा देश स्वतंत्रता के बजाय भय और अत्याचार का शिकार हो गया ! सन् 1976 में संविधान में 42 वां संशोधन किया गया, जिसके द्वारा न्यायपालिका को संसद के अधीन बना दिया गया और संसद तथा राज्य विधानसभाओं की अवधि बढ़ाकर 6 वर्ष कर दी गई !

18 जनवरी 1977 को नाटकीय ढंग से लोकसभा चुनाव कराए जाने की घोषणा की गई, यद्यपि विधि-अनुसार अभी लोकसभा की कार्य अवधि समाप्त होने में लगभग 15 महीने शेष थे यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि किन कारणों से श्रीमती गांधी ने चुनाव कराने का निर्णय लिया ! चुनाव की घोषणा के पश्चात राजनीतिक परिवर्तन बड़ी तेजी से भी और वह परिवर्तन सत्तारूढ़ दल की पराजय के कारण बन गए, चुनाव की घोषणा के पश्चात विपक्ष के नेताओं को जेल से रिहा कर दिया गया, प्रेस पर लगाये गए प्रतिबंधों को ढीला कर दिया गया और आतंकित जनता को यह आश्वासन दिया गया कि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र होंगे ! विपक्षी राजनीतिक दलों के बीच सैद्धांतिक मतभेद होने के बावजूद सामान्य यात्नाओं के भोगी होने के कारण उनमें एकता की भावना विकसित हुई, उन्होंने निश्चय किया कि हम सभी संगठित होकर कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लड़ेंगे !
20 जनवरी 1977 को मोरारजी देसाई ने एक नई पार्टी “जनता पार्टी” के निर्माण की घोषणा की, इस पार्टी में कांग्रेस (संगठन), भारतीय क्रांति दल, जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी सम्मिलित हुए, नवनिर्मित जनतापार्टी ने कांग्रेस के विरुद्ध देश के समक्ष एक विकल्प प्रस्तुत किया और अधिनायकवाद का अंत करने और जनतंत्र को पुनर्जीवित करने का नारा दिया !

श्रीमती गांधी द्वारा चुनाव कराए जाने की घोषणा जितनी आश्चर्यजनक थी उससे कहीं ज्यादा आश्चर्यजनक घटना कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और इंदिरा गाँधी मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य बाबू जगजीवनराम द्वारा कांग्रेस छोड़ने का निर्णय था, 2 फरवरी 1977 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस से त्यागपत्र देने और एक नया राजनीतिक दल “कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी” सीएफडी (लोकतांत्रिक कांग्रेस) बनाने की घोषणा की, साथ ही उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री एच.एन.बहुगुणा, उड़ीसा की भूतपूर्व मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी, और भूतपूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री के. गणेश तथा कुछ अन्य महत्वपूर्ण नेताओं ने भी कांग्रेस छोड़ने की घोषणा की ! इस प्रकार चुनाव की घोषणा के दो सप्ताह के अंदर भारत में दो राजनीतिक दलों का निर्माण हुआ जिनका सामान्य उद्देश्य कांग्रेस सरकार के तानाशाही शासन का अंत कराना था !
जल्द ही जनता पार्टी और सीएसडी के बीच चुनाव समझौता हो गया इसमें इन दोनों राजनीतिक दलों ने एक ही चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, इस प्रकार 1977 के चुनाव में कांग्रेस को अनेक राजनीतिक दलों के स्थान पर व्यावहारिक रूप से एक राजनीतिक दल से सीधे मुकाबला करना था ऐसी परिस्थितियों में हुए लोकसभा चुनाव के परिणामों ने विश्व के सभी देशों को चौंका दिया लोकसभा के कुल 542 सीटों में कांग्रेस को केवल 154 सीटें ही प्राप्त हुई और जनता पार्टी व सीएफडी को 295 सीटें मिली, चुनाव के साथ ही कांग्रेस दल के 30 वर्ष के शासन और राजनीतिक एकाधिकार का अंत भी हो गया !
साल 1977 के चुनाव में न केवल कांग्रेस पार्टी पराजित हुई बल्कि कुछ राज्यों में उसका बिल्कुल ही सफाया हो गया, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा , पंजाब और दिल्ली में उसे कोई भी सीट नहीं मिल सकी ! राजस्थान में उसे महज़ एक सीट से ही संतोष करना पड़ा !
ऐसा लगता है कि इस चुनाव में मतदाताओं की मूल रुचि इस बात में थी कि इंदिरा शासन का अंत होना चाहिए, उनकी रुचि इस बात में कम थी की जनता पार्टी के सिद्धांत या कार्यक्रम क्या हैं? इसलिए उसे “नकारात्मक चुनाव” निर्णय का नाम दिया गया, देश के शिक्षित मतदाता संविधान में किए गए 42वें संशोधन, मूल अधिकारों के स्थगन, आपातकाल में किए गए अत्याचार, राजनीति में विकसित होती हुई अधिनायकवादी प्रवृत्तियां तथा राजनीति में संजय गांधी के प्रवेश से ज्यादा दुखी थे ! जबकि साधारण और अशिक्षित जनता इन मुद्दों से ज्यादा नसबंदी के लिए किए गए अत्याचार के कारण अत्यधिक रुष्ट थी और वह किसी भी तरह इंदिरा शासन का अंत करना चाहती थी !
दल प्रणाली की दृष्टि से 1977 का चुनाव राजनीतिक दलों के ध्रुवीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, देश की चार बड़ी पार्टियों के एक राजनीतिक दल में संगठित हो जाने से भारत में द्विदलीय व्यवस्था के विकसित होने की संभावना उत्पन्न हो गई ! मई 1977 को बी एल डी, जनसंघ, कांग्रेस (संगठन), सोशलिस्ट पार्टी तथा सीएफडी ने औपचारिक रूप से अपने विघटन और जनता पार्टी में विलय हो जाने की घोषणा की !
लोकसभा में कांग्रेस की बुरी तरह पराजित होने के बाद जनता पार्टी के नेताओं तथा उसके समर्थकों ने यह दृष्टिकोण प्रतिपादित किया कि जनसाधारण का कांग्रेस सरकार और उसकी नीतियों और कार्यक्रमों पर से विश्वास उठ चुका है, परिणाम स्वरुप अनुच्छेद 356 के अधीन नौ राज्य विधानसभाओं का विघटन कर दिया गया ! जून 1977 में भारत के 10 राज्यों में विधानसभा के चुनाव कराए गए और इन चुनावों में भी तीन राज्यों के अतिरिक्त सभी में जनता पार्टी को भारी सफलता मिली

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