Kaiserganj Loksabha Election 2024: राजनीतिक चक्रव्यूह, कौन जीतेगा सियासी रण

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Kaiserganj Loksabha Election 2024: राजनीतिक चक्रव्यूह

उत्तर प्रदेश की सियासत में कैसरगंज (Kaiserganj) संसदीय सीट बेहद अहम है क्योंकि पिछले साल यहां के सांसद लगातार सुर्खियों में रहे | देश की कई नामचीन महिला पहलवानों ने सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर यौन शोषण का आरोप लगाया | ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले कैसरगंज संसदीय सीट पर राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है |

भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है कि वह बृजभूषण सिंह को फिर से यहां से मैदान में उतारे या नहीं | वहीं विपक्षी दल सांसद पर लगे यौन शोषण के आरोप को न सिर्फ कैसरगंज में बल्कि पूरे प्रदेश में मुद्दा बना सकती है | फिलहाल यहां पर इस बार पिछली बार की तुलना में ज्यादा कड़ा मुकाबला होने के आसार हैं |

कैसरगंज संसदीय सीट यूपी के 2 जिलों में गोंडा और बहराइच जिले में पड़ती है | यह सीट सामान्य वर्ग के तहत आती है | इस संसदीय सीट में पयागपुर, कैसरगंज, कटरा बाजार, करनैलगंज और तरबगंज 5 विधानसभा सीटें हैं |

गोंडा में कटरा, करनैलगंज और तरबगंज विधानसभा सीट आती हैं तो बहराइच जिले में पयागपुर और कैसरगंज विधानसभा सीट हैं | साल 2022 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 5 में से 4 सीटों पर जीत मिली थी | एक सीट (कैसरगंज) समाजवादी पार्टी के खाते में गई थी |

कब किस दल को मिली विजयश्री

कैसरगंज लोकसभा सीट के संसदीय इतिहास को देखें तो यहां पर पहला चुनाव 1952 में हुआ था | यहां पर कभी समाजवादी पार्टी का दबदबा हुआ करता था, सपा को लगातार 4 बार यहां पर जीत मिली थी | बाद में यह सीट बृजभूषण सिंह के नाम से पहचानी जाने लगी, वह लगातार 3 बार से यहां पर सांसद हैं, तो वही इस सीट पर कांग्रेस को भी अब तक 3 बार जीत मिली है |

1952 में हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ के टिकट पर शकुंतला नैय्यर चुनाव जीतने में कामयाब रही थीं | फिर 1957 में भगवानदीन मिश्रा को जीत मिली तो 1962 में स्वतंत्र पार्टी की बसंत कुमारी सांसद चुनी गई थीं |

1967 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर भारतीय जनसंघ को जीत मिली और शकुंतला नैय्यर दूसरी बार यहां से सांसद चुनी गईं | वह 1971 के चुनाव में भी जनसंघ के टिकट पर विजयी हुई थीं | हालांकि इमरजेंसी के बाद 1977 में कराए गए आम चुनाव में कांग्रेस को यहां से फिर हार मिली | जनता पार्टी के उम्मीदवार रुद्रसेन चौधरी सांसद चुने गए |

1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत के साथ वापसी की, उसके उम्मीदवार राना वीर सिंह सांसद चुने गए | राना वीर सिंह ने 1984 और 1989 के चुनाव में भी जीत हासिल की थी | 1991 के चुनाव से पहले देश में राम लहर का असर दिखने लगा था, इस वजह से बीजेपी ने इस सीट पर अपनी पहली जीत का स्वाद भी चखा | लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी सांसद चुने गए, इसके बाद बेनी प्रसाद वर्मा ने यहां से चुनाव में जीत का सिलसिला अगले कई चुनाव तक बनाए रखने में कामयाब रहे, बेनी प्रसाद वर्मा 1996 में सांसद चुने गए |

बेनी प्रसाद को मिली लगातार जीत

कभी सपा के कद्दावर नेता रहे और मुलायम सिंह यादव के करीबी नेताओं में रहे बेनी प्रसाद वर्मा ने कैसरगंज सीट से 1996 के बाद 1998, 1999 और 2004 के चुनाव में लगातार चार बार जीत दर्ज की |

इस बीच बेनी प्रसाद वर्मा और मुलायम सिंह यादव के रिश्ते खराब होते चले गए और दोनों में दूरियां बढ़ गई | फिर 2008 में बेनी प्रसाद वर्मा ने सपा छोड़ दिया और कांग्रेस में शामिल हो गए | 2009 के चुनाव में बेनी प्रसाद गोंडा सीट से जीत गए और केंद्र में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में इस्पात मंत्री बने |

2008 में परिसीमन के बाद यह सीट भी बदल गई और 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले कैसरगंज सीट से बाराबंकी वाले हिस्से को अलग कर दिया गया और गोंडा जिले के कुछ इलाके शामिल कर लिए गए |

इस बीच 2008 में बीजेपी छोड़कर सपा में आए बृजभूषण शरण सिंह ने 2009 के चुनाव में कैसरगंज से जीत हासिल की, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले वह सपा छोड़कर एक बार फिर बीजेपी में शामिल हो गए |

2019 के नतीजे

2019 के संसदीय चुनाव में कैसरगंज लोकसभा सीट के चुनावी परिणाम की बात करें तो यहां पर एकतरफा चुनाव हुआ था |

चुनाव में बीजेपी की ओर से बृजभूषण शरण सिंह मैदान में थे, जबकि बसपा ने चंद्रदेव राम यादव को मैदान में उतारा | चुनाव में सपा और बसपा के बीच चुनावी गठबंधन था | बृजभूषण शरण सिंह को 581,358 वोट मिले तो चंद्रदेव राम यादव के खाते में 319,757 वोट आए थे | कांग्रेस की स्थिति यहां पर भी काफी कमजोर रही और विनय कुमार पांडे को महज 37,132 वोट मिले थे |

चुनाव में बृजभूषण शरण सिंह ने 261,601 मतों के अंतर से बड़ी जीत हासिल की थी, तब के चुनाव में कैसरगंज लोकसभा सीट पर कुल वोटर्स की संख्या 17,79,143 थी |

पुरुष वोटर्स की संख्या 9,56,176 थी तो महिला वोटर्स की संख्या 8,22,895 थी | इसमें से कुल 9,81,400 (55.9%) वोटर्स ने वोट डाले, चुनाव में NOTA के पक्ष में 13,168 वोट पड़े थे |

कैसरगंज सीट पर किसका दबदबा

2014 के चुनाव में देश में मोदी लहर का असर दिखा. सपा छोड़कर बीजेपी में आए बृजभूषण शरण सिंह यहां से मैदान में उतरे और 3,81,500 वोट हासिल किया | उन्होंने सपा के विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह को 78,218 मतों के अंतर से हरा दिया | बसपा उम्मीदवार कृष्ण कुमार ओझा को 1,46,726 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहे |

2019 के चुनाव में बृजभूषण शरण सिंह ने अपनी जीत का दायरा बढ़ाते हुए 2,61,601 मतों के अंतर से जीत हासिल की, बृजभूषण को चुनाव में 5,81,358 वोट मिले तो उनके करीबी प्रतिद्वंद्वी बसपा के चंद्रदेव राम यादव को 3,19,757 वोट ही मिले थे |

कैसरगंज संसदीय सीट पर बृजभूषण शरण सिंह का खासा दबदबा माना जाता है और उनकी स्थानीय लोगों के बीच उनकी छवि काफी अच्छी बताई जाती है | हालांकि महिला पहलवानों की ओर से बृजभूषण शरण सिंह पर यौन शोषण के आरोप लगाए जाने के बाद वह लगातार सुर्खियों में बने रहे |

कैसरगंज का जातीय समीकरण

यहां के जातिगत समीकरण को देखें तो कैसरगंज एक क्षत्रिय बाहुल्य इलाका है तो गोंडा में कुछ इलाकों में ब्राह्मण वोटर्स का दबदबा है, यहां पर मुस्लिम वोटर्स की भी भूमिका अहम मानी जाती है |

2011 के जनगणना के मुताबिक, कैसरगंज सीट पर एससी वोटर्स की संख्या 14 फीसदी थी जबकि तब यहां पर मुस्लिम वोटर्स की संख्या 25.27% थी |

2009 से पहले कुर्मी वोटर्स की स्थिति अच्छी खासी हुआ करती थी और यही वजह है कि कुर्मी नेता बेनी प्रसाद वर्मा लगातार 5 बार इस इलाके से चुनाव जीतने में कामयाब रहे, हालांकि परिसीमन के बाद यहां पर स्थिति थोड़ी बदल गई है |

सियासी रुझान

जहां एक तरफ इस लोकसभा सीट पर वर्तमान बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह है तो वही दूसरी तरफ से इंडिया गठबंधन ने भी अब तक अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है |

सियासी जानकर बताते हैं कि पिछले तीन बार के लोकसभा आम चुनाव में इस सीट पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर क्षेत्र की जनता ने बृजभूषण शरण सिंह को भारी मतों से जीत दिलाई है तो वही लोगों में इस बात की भी चर्चा है कि बृजभूषण शरण सिंह को पार्टी आलाकमान इस बार साइड लाइन करने में लगी हुई है |

किंतु इस सीट पर बृजभूषण शरण सिंह का सियासी रसूख सर्वविदित है बीजेपी थिंक टैंक में लगातार इस बात की चर्चा है कि बृजभूषण शरण सिंह नहीं तो कौन?

यदि भाजपा द्वारा इस सीट पर कोई अन्य उम्मीदवार उतारा जाता है तो ऐसे में बृजभूषण शरण सिंह का क्या रुख होगा और अगर बृजभूषण शरण सिंह को बीजेपी रिपीट करती है तो भी इस सीट पर चुनावी मुकाबला कड़ा हो सकता है क्योंकि सपा और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं तो बसपा अकेले ही मैदान में उतर रही है |

ऐसे में भारतीय जनता पार्टी बृजभूषण शरण सिंह के सियासी रसूख को देखते हुए पुनः अपना उम्मीदवार बनाती है और इंडिया गठबंधन से कोई मजबूत उम्मीदवार होता है तो एक बेहतरीन लड़ाई हो सकती है!

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