Monday, May 20, 2024
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कृषि प्रधान देश में किसान बदहाल क्यों ?

भारत गेहूं, चावल, कपास, फल, सब्जियां और दाल सहित प्रमुख फसलों के शीर्ष 3 वैश्विक उत्पादकों में से एक है। भारत का सिंचित फसल क्षेत्र 8.26 मिलियन हेक्टेयर है जो दुनिया में सबसे बड़ा है और कृषि योग्य भूमि 159.7 मिलियन हेक्टेयर है जो दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है, इतना सबकुछ होने के बावजूद देश का किसान खुशहाल क्यों नहीं।
आर्थिक सर्वेक्षण 2020 -21 के अनुसार, कृषि ने 50% से अधिक भारतीय कार्यबल को रोजगार दिया और देश की जीडीपी में 20.2% का योगदान दिया था । 2016 में, कृषि और पशुपालन , वानिकी और मत्स्य पालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों का सकल घरेलू उत्पाद (सकल घरेलू उत्पाद) में 17.5% योगदान देने वाला किसान आत्महत्या करने पर मज़बूर क्यों।
रोज डेढ़ सौ से ज़्यादा किसान कर रहे हैं सुसाइड,
ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं 4 दिसंबर 2023 को नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो द्वारा जारी किये गए आँकड़ों के अनुसार साल 2022 में 11290 किसानों ने आत्महत्या की। किसानों की आत्महत्या के ये आंकड़े काफी हैरानी भरे हैं, क्योंकि अगर NCRB के साल 2021 के आंकड़ों को देखें तो साल 2022 का आंकड़ा उससे भी ज़्यादा है। साल 2021 में 10281 किसानों ने अपनी जान ली थी। 2022 से इन आंकड़ों को जोड़े तो 2022 में इसमें 3.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
भारत की आजादी के समय 70 फीसदी लोग खेती से जुड़े कामों में जुड़े थे, देश की राष्ट्रीय आय का 54 फीसदी हिस्सा भी इसी सेक्टर से आता था, लेकिन साल दर साल राष्ट्रीय उत्पाद में खेती का हिस्सा घटता चला गया । साल 2019-20 के आंकड़ों पर नजर डालें तो राष्ट्रीय उत्पाद में खेती का हिस्सा 17 फीसदी से भी कम रह गया ।

आज़ादी के समय से लेकर अब तक किसान संघर्ष में ही रहा

आजादी के समय 70 फीसदी लोग खेती से जुड़े थे जो अब घटकर 54 फीसदी पर आ गई है। इसमें एक आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है, साल 2017 में किसानों की आय दोगुनी करने के लिए बनाई गई समिति ने पाया है कि भले ही देश की जीडीपी में खेती की हिस्सेदारी घट रही हो लेकिन इस सेक्टर में काम करने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। इसका मतलब साफ है कि खेती ही भले ही घाटे का सौदा बन रही है,लेकिन गांवों में बेरोजगारों को रोजी-रोटी देने में आज भी यही सेक्टर सबसे आगे है।

कर्ज में डूबे छोटे किसानों की हालत खराब

सरकारी आंकड़ों की मानें तो ऐसे किसान जो 0.01 हेक्टअर से भी कम खेत के मालिक हैं वो कर्ज के जाल में फंसे हुए है। ऐसे किसानों की संख्या 24 लाख है और इनमें से 40 फीसदी पर 31000 का औसतन कर्ज है। सरकार के पास इनको इस स्थिति से निकलने का कोई कारगर योजना नहीं है यही वजह है की दिन प्रतिदिन किसान का खेती से मोह भंग होता जा रहा है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

अब बात करते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की जिस पर बहस और आंदोलन होते रहते है, एक तरह से समर्थन मूल्य सरकारी की तरफ से गारंटी है कि वो किसानों से तय की गई कीमत पर ही फसल खरीदेगी, लेकिन बहुत से किसानों को इसके बारे में जानकारी नहीं है। सरकारी मंडियों में वो बिचौलियों के हाथों फसल बेचने को मजबूर होते है। यही वजह है कि किसान एमएसपी को कानूनी जामा पहनाने की मांग करते रहते है। किसानों का कहना है कि एक बार कानून बन जाने पर एमएसपी से कम कीमत पर फसल खरीदना जुर्म के दायरे में जाएगा।

क्या है स्वामीनाथन फॉर्मूला

किसानों की मांग है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूले के हिसाब से दिया जाना चाहिए । आयोग ने C2+50% का फॉर्मूला सुझाया है जिसके मुताबिक C2 (लागत) और 50 फीसदी कुल लागत का दिया जाना चाहिए।

Swaminathan

अभी MSP से खुश क्यों नही हैं किसान?

किसानों का मानना है कि सरकार की ओर से एमएसपी का ऐलान तो होता है कि लेकिन इसके तहत गेहूं, धान और कॉटन को छोड़कर बाकी फसलों को मंडियों में एमएसपी से कम ही कीमत पर खरीदा जाता है। दरसअल बाकी की फसलों की कीमत बाजार और प्राइवेट कंपनियों ही तय करती हैं। यही किसानों की सबसे बड़ी समस्या है, किसानो का कहना है की इस पुरे सिस्टम में सिर्फ बिचौलिया को फायदा है क्योकि उनको कोई लागत नहीं लगानी और मजबूर किसान को झांसे में लेकर वो मनमाने रेट पर फसल खरीद लेते है और फिर उसे एक बहुत बड़े मार्जिन से बेचते है ,दरअसल किसानों का ये भी कहना है कि उनकी मांग ये ही नहीं है कि सारा अनाज सरकार ही खरीदे, लेकिन एमएसपी कानून बन जाने पर तय कीमत से कम कोई भी प्राइवेट कंपनी भी खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पायेगा। लेकिन यहां सवाल इस बात का भी है कि जब खेती के सेक्टर में भूमिहीन या खेतिहर मजदूरों की संख्या बढ़ रही है और कम हेक्टेअर की जोत वाले किसान ज्यादा हैं तो एमएसपी का कानून बन जाने पर ज्यादा फायदा किसे होगा?

लागत है बड़ी समस्या

सिंचाई के लिए पानी की कमी

भारत में जिस तरह की फसलें बोई जाती है उनके के लिए पानी बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन खरीफ में अनियमित बारिश की समस्या हो या रबी फसलों के लिए पानी की कमी की समस्या हो, किसानों को हर वक्त पानी की कमी को सहना पड़ता है। आज के दौर में जहां जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है, भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है ये समस्या भयानक होने की तरफ बढ़ रही है।

छोटी और बिखरी हुई भूमि

आज भारतीय कृषि की समस्याएं यही है किसानों के सबसे बड़े हिस्से के पास सबसे कम जमीन है। भारत में लघु व सीमांत किसान 86% है लेकिन उनके अधिकार में 50% से भी कम भूमि है। भूमि के असमान वितरण और छोटे किसानों की अधिक संख्या एक ऐसी समस्या है जिसका जवाब ढूंढना बहुत कठिन है।

कृषि के प्रति नई पीढ़ी में उदासीनता

भारतीय किसानो पर किए कई सर्वे में यह सामने आया है कि 50% किसान अपने बच्चों को किसानी नहीं करवाना चाहते। साथ ही, नई पीढ़ी में खेती के प्रति कम रूचि है। हालाँकि, आज भी कृषि से देश का 49% रोजगार उपलब्ध होता है पर आने वाले समय में यह बड़ी समस्या हो सकती है। किसान खुद ही अपने बच्चो को खेती से दूर रख रहे है जिससे नयी पीढ़ी के जोश और आधुनिक ज्ञान का लाभ नहीं मिल पा रहा है
सरकारी योजनाओं का असफल क्रियान्वयन
सरकारें कई योजनाएं बनाती हैं पर उनका पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता। पहले तो किसानों में योजनाओं के प्रति जागरूकता की कमी है अगर जागरूकता हो भी तो सरकारी अफसरों के भ्रष्टाचार और कागज़ी झंझटो का सामना करना पड़ता है। समस्या गंभीर है पर जैसे जैसे किसान शिक्षित होते जाएंगे और सरकारी संस्थाओं का डिजिटलाइजेशन होगा इस समस्या का भी समाधान हो जाएगा। इसके साथ ही, हमें लगता है कि भारत सरकार को समय-समय पर जागरूकता अभियान चलने चाहिए। इसके लिए पारदर्शी योजना के साथ साथ किसान को प्रशिक्षित करने की जरुरत है .

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