Farmer Protest: भारत में हुए किसानो के आंदोलनों का पुनरावलोकन

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Farmer Protest
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Farmer Protest: आमतौर पर यह माना जाता है कि भारतीय समाज में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल में किसानों की कोई सार्थक भूमिका नहीं रही है, लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का अहम योगदान रहा है। स्वतंत्रता से पहले किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में जो आंदोलन किए वे गांधीजी के प्रभाव के कारण हिंसा और बरबादी से भरे नहीं होते थे, लेकिन अब स्वतंत्रता के बाद जो किसानों के नाम पर आंदोलन या उनके आंदोलन हुए वे हिंसक और राजनीति से ज्यादा प्रेरित थे। देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में जो आंदोलन हुए थे, इन आंदोलनों का नेतृत्व महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया। आमतौर पर किसानों के आंदोलन या उनके विद्रोह की शुरुआत सन् 1859 से हुई थी, लेकिन चूंकि अंग्रेजों की नीतियों पर सबसे ज्यादा किसान प्रभावित हुए, इसलिए आजादी के पहले भी इन नीतियों ने किसान आंदोलनों की नींव डाली। सन् 1857 के असफल विद्रोह के बाद विरोध का मोर्चा किसानों ने ही संभाला, क्योंकि अंग्रेजों और देशी रियासतों के सबसे बड़े आंदोलन उनके शोषण से उपजे थे। वास्तव में जितने भी ‘किसान आंदोलन‘ हुए, उनमें अधिकांश आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ थे। उस समय के समाचार पत्रों ने भी किसानों के शोषण, उनके साथ होने वाले सरकारी अधिकारियों की ज्यादतियों का सबसे बड़ा संघर्ष, पक्षपातपूर्ण व्यवहार और किसानों के संघर्ष को प्रमुखता से प्रकाशित किया।

किसान प्रतिरोध भारत के इतिहास में बहुत पुरानी संस्कृति है। मध्यकालीन शासन काल में भी सामंती ढांचे में किसान पिस रहा था उस समय के किसान विद्रोह की झलक उस समय के तत्कालीन साहित्य और इतिहास में मिलती है। मध्यकालीन समय में विद्रोही किसानों के गाँव ‘मवास’ के रूप में पहचाने जाते थे। औपनिवेशकालीन अंग्रेजी सत्ता काबिज होने के पश्चात् भारत में और दमन करती थी। किसानों के दमन, शोषण, उत्पीड़न की राजनीतिक-आर्थिक गाथा है। जब किसान कोई समाधान नहीं निकाल पा रहे थे, तब किसान औपनिवेश और सामंती नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध शुरू कर दिए और इन प्रतिरोधों का दमन शुरू हो गया था। अब किसानों ने सामूहिक विद्रोह की राह चुन ली। ये विद्रोह सशस्त्र रूप भी धारण किए थे। शुरुआत 1767-68 ई. में त्रिपुरा के शमशेर गाजी विद्रोह से हो गई. ‘‘जब सभी मान्य विकल्प समाधान के संदर्भ में अपने हथियार डाल देते हैं। तब उत्पीड़ित वास्तविक हथियार हाथ में उठाता है। इसके प्रयोग    के जरिए वह सत्ता से टकराता है और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में गुणात्मक बदलाव लाने की कोशिश करता है। उसके संघर्ष कभी सफल होते हैं, कभी नाकाम रहते हैं पर इनकी भी ऊर्जावान निरंतरता बनी रहती है। इससे खेतिहर समाज की जीवंतता सिद्ध होती है। उदाहरण के लिए 1778 से लेकर आज तक सैकड़ों छोटे-बड़े विद्रोह हो चुके हैं।’’    आइये, हम इन किसान बगावतों पर एक नजर डालें।

आंदोलनकारी किसान चाहे तेलंगाना के हों या नक्सलवाड़ी के हिंसक लड़ाके, सभी ने छापामार आंदोलन को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजों ने देशी रियासतों की मदद से दबा तो दिया, लेकिन देश में कई स्थानों पर संग्राम की ज्वाला लोगों के दिलों में धधकती रही। इसी बीच अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आंदोलन हुए। नील पैदा करने वाले किसानों का विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आंदोलन के रूप में जाने जाते हैं।

1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेज़ों ने कुछ देशी रियासतों की सहायता से दबा तो दिया, लेकिन इसके पश्चात् भी भारत में कई जगहों पर संग्राम की ज्वाला लोगों के दिलों में दहकती रही। इसी बीच अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आन्दोलन हुए। इनमें से अधिकांश आन्दोलन अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ किये गए थे। कितने ही समाचार पत्रों ने किसानों के शोषण, उनके साथ होने वाले सरकारी अधिकारियों के पक्षपातपूर्ण व्यवहार और किसानों के संघर्ष को अपने पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित किया था। नील विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आन्दोलन, चम्पारन सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आन्दोलन के रूप में जाने जाते हैं। जहाँ 1918 ई. का खेड़ा सत्याग्रह गाँधीजी द्वारा शुरू किया गया, वहीं ‘मेहता बन्धुओं’ (कल्याण जी तथा कुँवर जी) ने भी 1922 ई. में बारदोली सत्याग्रह को प्रारम्भ किया था। बाद में इस सत्याग्रह का नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के हाथों में रहा

नील आन्दोलन

यह आन्दोलन भारतीयों किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के ख़िलाफ़ बंगाल में किया गया। अपनी आर्थिक माँगों के सन्दर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आन्दोलन उस समय का एक विशाल आन्दोलन था। अंग्रेज़ अधिकारी बंगाल तथा बिहार के ज़मींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिये ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश करते थे, तथा नील उत्पादक किसानों को एक मामूली सी रक़म अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थे, जो बाज़ार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को ‘ददनी प्रथा’ कहा जाता था, जबकि किसान अपनी उपजाऊ ज़मीन पर चावल की खेती करना चाहते थे।

इस आन्दोलन की सर्वप्रथम शुरुआत सितम्बर, 1859 ई. में बंगाल के ‘नदिया ज़िले’ के गोविन्दपुर गाँव से हुई। भारतीय किसानों ने अंग्रेज़ों द्वारा अपने साथ दासों जैसा व्यवहार करने के कारण ही विद्रोह किया। यह आन्दोलन ‘नदिया’, ‘पाबना’, ‘खुलना’, ‘ढाका’, ‘मालदा’, ‘दीनाजपुर’ आदि स्थानों पर फैला था। किसानों की आपसी एकजुटता, अनुशासन एवं संगठित होने के बदौलत ही आन्दोलन पूर्णरूप से सफल रहा। इसकी सफलता के सामने अंग्रेज़ सरकार को झुकना पड़ा और रैय्यतों की स्वतन्त्रता को ध्यान में रखते हुए 1860 ई. के नील विद्रोह का वर्णन ‘दीनबन्धु मित्र’ ने अपनी पुस्तक ‘नील दर्पण’ में किया है। इस आन्दोलन की शुरुआत ‘दिगम्बर’ एवं ‘विष्णु विश्वास’ ने की थी। ‘हिन्दू पैट्रियट’ के संपादक ‘हरीशचन्द्र मुखर्जी’ ने नील आन्दोलन में काफ़ी काम किया। किसानों के शोषण, सरकारी अधिकारियों के पक्षपात ओर इसके विरुद्ध विभिन्न स्थानों पर चल रहे किसानों के संघर्ष में उन्होंने अख़बार में लगातार ख़बरें छापीं। मिशनरियों ने भी नील आन्दोलन के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभाई। इस आन्दोलन के प्रति सरकार का भी रवैया काफ़ी संतुलित रहा। 1860 ई. तक नील की खेती पूरी तरह ख़त्म हो गई।

पाबना विद्रोह

पाबना विद्रोह 1873 से 1876 ई. तक चला था। पाबना ज़िले के काश्तकारों को 1859 ई. में एक एक्ट द्वारा बेदख़ली एवं लगान में वृद्धि के विरुद्ध एक सीमा तक संरक्षण प्राप्त हुआ था, इसके बाबजूद भी ज़मींदारों ने उनसे सीमा से अधिक लगान वसूला एवं उनको उनकी ज़मीन के अधिकार से वंचित किया। ज़मींदार को ज़्यादती का मुकाबला करने के लिए 1873 ई. में पाबना के ‘युसुफ़ सराय’ के किसानों ने मिलकर एक ‘कृषक संघ’ का गठन किया। इस संगठन का मुख्य कार्य पैसे एकत्र करना एवं सभायें आयोजित करना होता था।

कालान्तर में पूर्वी बंगाल के अनेक ज़िले ढाका, मैमनसिंह, त्रिपुरा, बेकरगंज, फ़रीदपुर, बोगरा एवं राजशाही में इस तरह के आन्दोलन हुए। किसान संघ ने बढ़े लगान की अदायगी रोककर पैमाइश की माप में परिवर्तन एवं अवैधानिक करों की समाप्ति तथा लगान में कमी करवाने की अपनी माँगों को पूरा करवाना चाहा। यह आन्दोलन कुछ मामलों में अहिंसक था। यह ज़मींदारों के विरुद्ध किया गया आन्दोलन था, न कि अंग्रेज़ों के विरुद्ध। पाबना के किसानों ने अपनी माँग में यह नारा दिया कि, ‘हम महामहिम महारानी की और केवल उन्हीं की रैय्यत होना चाहते हैं’। तत्कालीन गवर्नर कैम्पबेल ने एक घोषणा में इनकी माँगों को उचित ठहराया।

इस आन्दोलन में रैय्यतों अधिकतर मुसलमान एवं ज़मींदारों में अधिकतर हिन्दू थे। इस आन्दोलन के महत्त्वपूर्ण नेताओं में ईशान चन्द्र राय, शंभुपाल आदि थे। पाबना विद्रोह का समर्थन कई युवा बुद्धिजीवियों ने किया, जिनमें बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय और आर.सी. दत्त शामिल थे। 1880 ई. के दशक में जब बंगाल काश्तकारी विधेयक पर चर्चा चल रही थी, तब सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, आनंद मोहन बोस और द्वारका नाथ गांगुली ने एसोसिएशन के माध्यम से काश्तकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए अभियान चलाया। इन लोगों ने माँग की थी, कि ज़मीन पर मालिकाना हक उन लोगों को दिया जाना चाहिए, जो वस्तुतः उसे जोतते हों।

दक्कन विद्रोह

दक्कन विद्रोह महाराष्ट्र के पूना, अहमदाबाद, सतारा और शोलापुर आदि में मुख्य रूप से फैला। यह विद्रोह साहूकारों के विरुद्ध किया गया था।महाराष्ट्र के पूना एवं अहमदनगर ज़िलों में गुजराती एवं मारवाड़ी साहूकार ढेर सारे हथकण्डे अपनाकर किसानों का शोषण कर रहे थे।दिसम्बर, 1874 ई. में एक सूदखोर कालूराम ने किसान (बाबा साहिब देशमुख) के ख़िलाफ़ अदालत से घर की नीलामी की डिक्री प्राप्त कर ली। इस पर किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया।साहूकारों के विरुद्ध आन्दोलन की शुरुआत 1874 ई. में शिरूर तालुका के करडाह गाँव से हुई।1875 ई. तक यह आन्दोलन पूना, अहमदाबाद, सतारा, शोलापुर आदि ज़िलों में फैल गया।किसानों ने साहूकारों के घरों एवं दुकानों को नष्ट कर दिया।ब्रिटिश सरकार ने ‘दक्कन उपद्रव आयोग’ का गठन किया। किसानों की स्थिति में सुधार हेतु 1876 ई. में ‘दक्कन कृषक राहत अधिनियम’ को पारित किया गया।महाराष्ट्र के पूना एवं अहमदनगर ज़िलों में गुजराती एवं मारवाड़ी साहूकार ढेर सारे हथकण्डे अपनाकर किसानों का शोषण कर रहे थे। दिसम्बर 1874 ई. में एक सूदखोर कालूराम ने किसान (बाबा साहिब देशमुख) के ख़िलाफ़ अदालत से घर की नीलामी की डिक्री प्राप्त कर ली। इस पर किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया। इन साहूकारों के विरुद्ध आन्दोलन की शुरुआत 1874 ई. में शिरूर तालुका के करडाह गाँव से हुई।

होमरूल लीग के कार्यकताओं के प्रयास तथा गौरीशंकर मिश्र, इन्द्र नारायण द्विवेदी तथा मदन मोहन मालवीय के दिशा निर्देशन के परिणामस्वरूप फ़रवरी, 1918 ई. में उत्तर प्रदेश में ‘किसान सभा’ का गठन किया गया। 1919 ई. के अन्तिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया। प्रतापगढ़ ज़िले की एक जागीर में ‘नाई धोबी बंद’ सामाजिक बहिष्कार संगठित कारवाई की पहली घटना थी। अवध की तालुकेदारी में ग्राम पंचायतों के नेतृत्व में किसान बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया। झिंगुरीपाल सिंह एवं दुर्गपाल सिंह ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन जल्द ही एक चेहरे के रूप में बाबा रामचन्द्र उभर कर सामने आए। उत्तर प्रदेश के किसान आन्दोलन को 1920 ई. के दशक में सर्वाधिक मज़बूती बाबा रामचन्द्र ने प्रदान की। उनके व्यक्तिगत प्रयासों से ही 17 अक्टूबर, 1920 ई. को प्रतापगढ़ ज़िले में ‘अवध किसान सभा’ का गठन किया गया। प्रतापगढ़ ज़िले का ‘खरगाँव’ किसान सभा की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। इस संगठन को जवाहरलाल नेहरू, गौरीशंकर मिश्र, माता बदल पांडे, केदारनाथ आदि ने अपने सहयोग से शक्ति प्रदान की। उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर ज़िलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने ‘एका आन्दोलन’ नाम का आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन में कुछ ज़मींदार भी शामिल थे। इस आन्दोलन के प्रमुख नेता ‘मदारी पासी’ और ‘सहदेव’ थे। ये दोनों निम्न जाति के किसान थे।

मोपला विद्रोह (1920 ई.)

केरल के मालाबार क्षेत्र में मोपलाओं द्वारा 1920 ई. में विद्राह किया गया। प्रारम्भ में यह विद्रोह अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ॅ था। महात्मा गाँधी, शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे नेताओं का सहयोग इस आन्दोलन को प्राप्त था। इस आन्दोलन के मुख्य नेता के रूप में ‘अली मुसलियार’ चर्चित थे। 15 फ़रवरी, 1921 ई. को सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर ख़िलाफ़त तथा कांग्रेस के नेता याकूब हसन, यू. गोपाल मेनन, पी. मोइद्दीन कोया और के. माधवन नायर को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद यह आन्दोलन स्थानीय मोपला नेताओं के हाथ में चला गया। 1920 ई. में इस आन्दोलन ने हिन्दू-मुसलमानों के मध्य साम्प्रदायिक आन्दोलन का रूप ले लिया, परन्तु शीघ्र ही इस आन्दोलन को कुचल दिया गया। कृषि सम्बन्धी समस्याओं के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ सरकार से लड़ने के लिए बनाये गये इस संगठन के संस्थापक भगत जवाहरमल थे। 1872 ई. में इनके शिष्य बाबा राम सिंह ने अंग्रेज़ों का कड़ाई से सामना किया। कालान्तर में उन्हें कैद कर रंगून (अब यांगून) भेज दिया गया, जहाँ पर 1885 ई. में उनकी मृत्यु हो गई।

रामोसी किसानों का विद्रोह

महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में रमोसी किसानों ने ज़मींदारों के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह किया।

रंपाओं का विद्रोह

आन्ध्र प्रदेश में सीताराम राजू के नेतृत्व में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध यह विद्रोह हुआ, जो 1879 ई. से लेकर 1920-22 ई. तक छिटपुट ढंग से चलता रहा। रंपाओं को ‘मुट्टा’ तथा उनके ज़मींदार को ‘मुट्टादार’ कहते थे। सुलिवन ने रंपाओं के विद्रोह के कारणों की जाँच की। उसने नये ज़मीदारों को हटाकर पुराने ज़मींदारों को रखने की सिफारिश की थी।

कूका विद्रोह

कूका विद्रोह की शुरुआत पंजाब में 1860-1870 ई. में हुई थी।वहाबी विद्रोह की भाँति ‘कूका विद्रोह’ का भी आरम्भिक स्वरूप धार्मिक था, किन्तु बाद में यह राजनीतिक विद्रोह के रूप में परिवर्तित हो गया।इसका सामान्य उद्देश्य अंग्रेज़ों को देश से बाहर निकालना था।पश्चिमी पंजाब में ‘कूका विद्रोह’ की शुरुआत लगभग 1840 ई. में ‘भगत जवाहर मल’ द्वारा की गयी थी।भगत जवाहर मल को ‘सियान साहब’ के नाम से भी जाना जाता था।प्रारम्भ में इस विद्रोह का उद्देश्य सिक्ख धर्म में प्रचलित बुराईयों को दूर कर इसे शुद्ध करना था।सियान साहब ने अपने शिष्य ‘बालक सिंह’ के साथ मिलकर अपने अनुयायियों का एक दल गठित किया।इस दल का मुख्यालय ‘हजारा’ में हुआ करता था।इस विद्रोह के विरुद्ध अपनी दमनकारियों नीतियों को अपनाते हुये अंग्रेज़ों ने 1872 ई. में इसके एक नेता ‘रामसिंह’ को रंगून (अब यांगून) निर्वासित कर दिया और आन्दोलन पर नियन्त्रण पा लिया गया।

ताना भगत आन्दोलन

ताना भगत आन्दोलन की शुरुआत वर्ष 1914 ईं. में बिहार में हुई थी। यह आन्दोलन लगान की ऊँची दर तथा चौकीदारी कर के विरुद्ध किया गया था। इस आन्दोलन के प्रवर्तक ‘जतरा भगत’ थे, जिसे कभी बिरसा मुण्डा, कभी जमी तो कभी केसर बाबा के समतुल्य होने की बात कही गयी है। इसके अतिरिक्त इस आन्दोलन के अन्य नेताओं में बलराम भगत, गुरुरक्षितणी भगत आदि के नाम प्रमुख थे।

‘मुण्डा आन्दोलन’ की समाप्ति के क़रीब 13 वर्ष बाद ‘ताना भगत आन्दोलन’ शुरू हुआ। यह ऐसा धार्मिक आन्दोलन था, जिसके राजनीतिक लक्ष्य थे। यह आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नये ‘पंथ’ के निर्माण का आन्दोलन था। इस मायने में यह बिरसा मुण्डा आन्दोलन का ही विस्तार था। मुक्ति-संघर्ष के क्रम में बिरसा मुण्डा ने जनजातीय पंथ की स्थापना के लिए सामुदायिकता के आदर्श और मानदंड निर्धरित किये थे।

ताना भगत आन्दोलन में उन आदर्शों और मानदंडों के आधर पर जनजातीय पंथ को सुनिश्चित आकार प्रदान किया गया। बिरसा ने संघर्ष के दौरान शांतिमय और अहिंसक तरीके विकसित करने के प्रयास किये। ताना भगत आन्दोलन में अहिंसा को संषर्ष के अमोघ अस्त्र के रूप में स्वीकार किया गया। बिरसा आन्दोलन के तहत झारखंड में ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ संघर्ष का ऐसा स्वरूप विकसित हुआ, जिसको क्षेत्रीयता की सीमा में बांधा नहीं जा सकता था। इस आन्दोलन ने संगठन का ढांचा और मूल रणनीति में क्षेत्रीयता से मुक्त रह कर ऐसा आकार ग्रहण किया कि वह महात्मा गाँधी के नेतृत्व में जारी आज़ादी के ‘भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन’ का अविभाज्य अंग बन गया।

प्राप्त ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार जतरा भगत, जो उराँव जाति के थे, उनके नेतृत्व में इस आन्दोलन के लिए जो संगठन नये पंथ के रूप में विकसित हुआ, उसमें क़रीब 26 हज़ार सदस्य शामिल थे। वह भी वर्ष 1914 के दौर में। जतरा भगत का जन्म वर्तमान गुमला ज़िले के बिशुनपुर प्रखंड के चिंगारी गांव में 1888 में हुआ था। जतरा भगत ने 1914 में आदिवासी समाज में पशु बलि, मांस भक्षण, जीव हत्या, शराब सेवन आदि दुर्गुणों को छोड़ कर सात्विक जीवन यापन करने का अभियान छेड़ा। उन्होंने भूत-प्रेत जैसे अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ सात्विक एवं निडर जीवन की नयी शैली का सूत्रपात किया। उस शैली से शोषण और अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने की नयी दृष्टि आदिवासी समाज में पनपने लगी। तब आन्दोलन का राजनीतिक लक्ष्य स्पष्ट होने लगा था। सात्विक जीवन के लिए एक नये पंथ पर चलने वाले हज़ारों आदिवासी जैसे सामंतों, साहुकारों और ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ संगठित ‘अहिंसक सेना’ के सदस्य हो गये।

जतरा भगत के नेतृत्व में ऐलान हुआ कि “मालगुज़ारी नहीं देंगे, बेगारी नहीं करेंगे और कर नहीं देंगे”। इसके साथ ही जतरा भगत का विद्रोह ‘ताना भगत आन्दोलन’ के रूप में सुर्खियों में आ गया। आन्दोलन के मूल चरित्र और नीति को समझने में असमर्थ अंग्रेज़ सरकार ने घबराकर जतरा भगत को 1914 में गिरफ्तार कर लिया। उन्हें डेढ़ साल की सजा दी गयी। जेल से छूटने के बाद जतरा का अचानक देहांत हो गया, लेकिन ताना भगत आन्दोलन अपनी अहिंसक नीति के कारण निरंतर विकसित होते हुए महात्मा गाँधी के ‘स्वदेशी आन्दोलन’ से जुड़ गया। यह तो कांग्रेस के इतिहास में भी दर्ज है कि 1922 में कांग्रेस के गया सम्मेलन और 1923 के नागपुर सत्याग्रह में बड़ी संख्या में ताना भगत शामिल हुए थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में ताना भगतों ने महात्मा गाँधी को 400 रुपये की थैली दी थी।

कालांतर में रीति-रिवाजों में भिन्नता के कारण ताना भगतों की कई शाखाएं पनप गयीं। उनकी प्रमुख शाखा को ‘सादा भगत’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त ‘बाछीदान भगत’, ‘करमा भगत’, ‘लोदरी भगत’, ‘नवा भगत’, ‘नारायण भगत’, ‘गौरक्षणी भगत’ आदि कई शाखाएं हैं।

अधिनियम का निर्माण

1948 में भारत की आज़ाद सरकार ने ‘ताना भगत रैयत एग्रिकल्चरल लैंड रेस्टोरेशन एक्ट’ पारित किया। यह अधिनियम अपने आप में ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ ताना भगतों के आन्दोलन की व्यापकता और उनकी कुर्बानी का आईना था। इस अधिनियम में 1913 से 1942 तक की अवधि में अंग्रेज़ सरकार द्वारा ताना भगतों की नीलाम की गयी जमीन को वापस दिलाने का प्रावधान किया गया था।

तेभागा आन्दोलन

तेभागा आन्दोलन बंगाल का प्रसिद्ध किसान आन्दोलन था। वर्ष 1946 ई. का यह आन्दोलन सर्वाधिक सशक्त आन्दोलन था, जिसमें किसानों ने ‘फ्लाइड कमीशन’ की सिफ़ारिश के अनुरूप लगान की दर घटाकर एक तिहाई करने के लिए संघर्ष शुरू किया था। यह आन्दोलन जोतदारों के विरुद्ध बंटाईदारों का आन्दोलन था। इस आन्दोलन के महत्त्वपूर्ण नेता ‘कम्पाराम सिंह’ एवं ‘भवन सिंह’ थे।

किसान आन्दोलन

बंगाल का ‘तेभागा आंदोलन’ फ़सल का दो-तिहाई हिस्सा उत्पीडि़त बटाईदार किसानों को दिलाने का आंदोलन था। यह बंगाल के 28 में से 15 ज़िलों में फैला, विशेषकर उत्तरी और तटवर्ती सुन्दरबन क्षेत्रों में। ‘किसान सभा’ के आह्वान पर लड़े गए इस आंदोलन में लगभग 50 लाख किसानों ने भाग लिया और इसे खेतिहर मज़दूरों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। सन 1946 वह वर्ष था, जब भारत के लोगों के आंदोलन बड़े पैमाने पर उमड़ रहे थे। केन्द्रीय नौसेना हड़ताल समिति के आह्वान पर फ़रवरी में बम्बई, कराची और मद्रास के नौसैनिकों की हड़ताल हुई। जब बम्बई के बन्दरगाह मज़दूरों ने इसका समर्थन किया तो बकौल नौसेना हड़ताल कमेटी, पहली बार सैनिकों और आम आदमियों का रक्त एक ही उद्देश्य के लिए सड़कों पर बहा, जिसमें लगभग 250 लोग मारे गए।

गाँधीजी की प्रेरणा

सितम्बर, 1946 में ‘किसान सभा’ ने तेभागा चाई का आह्वान किया। यह अगस्त, 1946 में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुए साम्प्रदायिक कत्लेआम के तुरन्त बाद किया गया, जिसके बाद अक्टूबर में पूर्वी ज़िले नोवाखौली में भी साम्प्रदायिक दंगे हुए। आन्दोलन के मुख्य इलाके की किसान जनता हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों की थी। आदिवासी किसानों ने भी इसमें भाग लिया। यह आन्दोलन अंग्रेज़ शासन के दौरान शुरू हुआ, जब मुस्लिम लीग का सुहरावर्दी मंत्रिमंडल राज कर रहा था। जब महात्मा गाँधी हिन्दू–मुस्लिम मैत्री और प्रार्थना सभाओं का नारा लेकर सामन्तों के साथ नोवाखौली के ग्रामीण अंचल में दौरा कर रहे थे। तब इस वर्ग संघर्ष ने दोनों सम्प्रदायों के दसियों लाख किसानों को प्रेरित करके अपने पीछे समेट लिया।

इस संघर्ष ने उन सभी जमींदारों को निशाना बनाया, जो साम्प्रदायिक घृणा फैलाने में सक्रिय रहे। इस संघर्ष ने तमाम प्रतिकूल दुष्प्रचार तथा साम्प्रदायिक उकसावे का मुकाबला करते हुए वर्गीय आधार पर जनता की वास्तविक एकता स्थापित की और साम्प्रदायिक शक्तियों को हतोत्साहित कर दिया। किसानों ने तीव्र पुलिस दमन और अत्याचार का मुकाबला करते हुए नवम्बर, 1946 से फ़रवरी, 1947 के बीच फ़सल के दो-तिहाई हिस्से पर अपने कब्जे को बरकरार रखा।

तेलंगाना आन्दोलन

आंध्र प्रदेश में यह आन्दोलन ज़मींदारों एवं साहूकारों के शोषण की नीति के ख़िलाफ़ तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध 1946 ई. में किया गया था। 1858 ई. के बाद हुए किसान आन्दोलनों का चरित्र पूर्व के आन्दोलन से अलग था। अब किसान बगैर किसी मध्यस्थ के स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़ने लगे। इनकी अधिकांश माँगे आर्थिक होती थीं। किसान आन्दोलन ने राजनीतिक शक्ति के अभाव में ब्रिटिश उपनिवेश का विरोध नहीं किया। किसानों की लड़ाई के पीछे उद्देश्य व्यवस्था-परिवर्तन नहीं था, बल्कि वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे। इन आन्दोलनों की असफलता के पीछे किसी ठोस विचारधारा, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों का अभाव था।

बिजोलिया किसान आन्दोलन भारतीय इतिहास में हुए कई किसान आन्दोलनों में से महत्त्वपूर्ण था। यह ‘किसान आन्दोलन’ भारत भर में प्रसिद्ध रहा, जो मशहूर क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में चला था। बिजोलिया किसान आन्दोलन सन 1847 से प्रारम्भ होकर क़रीब अर्द्ध शताब्दी तक चलता रहा। जिस प्रकार इस आन्दोलन में किसानों ने त्याग और बलिदान की भावना प्रस्तुत की, इसके उदाहरण अपवादस्वरूप ही प्राप्त हैं। किसानों ने जिस प्रकार निरंकुश नौकरशाही एवं स्वेच्छाचारी सामंतों का संगठित होकर मुक़ाबला किया, वह इतिहास बन गया।

पंचायतों के माध्यम से समानांतर सरकार स्थापित कर लेना एवं उसका सफलतापूर्वक संचालन करना अपने आप में आज भी इतिहास की अनोखी व सुप्रसिद्ध घटना प्रतीत होती है। इस आन्दोलन के प्रथम भाग का नेतृत्व पूर्णरूप से स्थानीय था, दूसरे भाग में नेतृत्व का सूत्र विजय सिंह पथिक के हाथ में था और तीसरे भाग में राष्ट्रीय नेताओं के निर्देशन में आन्दोलन संचालित हो रहा था। किसानों की माँगों को लेकर 1922 में समझौता हो गया था, परंतु इस समझौते को क्रियांवित नहीं किया जा सका। इसीलिए ‘बिजोलिया किसान आन्दोलन’ ने तृतीय चरण में प्रवेश कर लिया था। निस्सन्देह बिजोलिया किसान आन्दोलन ने राजस्थान ही नहीं, भारत के अन्य किसान आन्दोलनों को भी प्रभावित किया था।

जब ‘लाहौर षड़यंत्र केस’ में विजय सिंह पथिक का नाम उभरा और उन्हें लाहौर ले जाने के आदेश हुए तो किसी तरह यह खबर पथिक जी को मिल गई। वे टाडगढ़ के क़िले से फरार हो गए। गिरफ्तारी से बचने के लिए पथिक जी ने अपना वेश राजस्थानी राजपूतों जैसा बना लिया और चित्तौडगढ़ क्षेत्र में रहने लगे। बिजोलिया से आये एक साधु सीताराम दास उनसे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने पथिक जी को बिजोलिया आन्दोलन का नेतृत्व सम्भालने को आमंत्रित किया। बिजोलिया उदयपुर रियासत में एक ठिकाना था। जहाँ पर किसानों से भारी मात्रा में मालगुज़ारी वसूली जाती थी और किसानों की दशा अति शोचनीय थी। विजय सिंह पथिक 1916 में बिजोलिया पहुँच गए औरउन्होंने आन्दोलन की कमान अपने हाथों में सम्भाल ली।

प्रत्येक गाँव में किसान पंचायत की शाखाएँ खोली गईं। किसानों की मुख्य माँगें भूमि कर, अधिभारों एवं बेगार से सम्बन्धित थीं। किसानों से 84 प्रकार के कर वसूले जाते थे। इसके अतिरिक्त युद्ध कोष कर भी एक अहम मुद्दा था। एक अन्य मुद्दा साहूकारों से सम्बन्धित भी था, जो ज़मींदारों के सहयोग और संरक्षण से किसानों को निरन्तर लूट रहे थे। पंचायत ने भूमि कर न देने का निर्णय लिया।

किसान वास्तव में 1917 की रूसी क्रान्ति की सफलता से उत्साहित थे, पथिक जी ने उनके बीच रूस में श्रमिकों और किसानों का शासन स्थापित होने के समाचार को खूब प्रचारित किया था। विजय सिंह पथिक ने कानपुर से प्रकाशित गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा सम्पादित पत्र ‘प्रताप’ के माध्यम से बिजोलिया के किसान आन्दोलन को समूचे देश में चर्चा का विषय बना दिया।

1919 में अमृतसर कांग्रेस में पथिक जी के प्रयत्न से बाल गंगाधर तिलक ने बिजोलिया सम्बन्धी प्रस्ताव रखा। पथिक जी ने बम्बई जाकर किसानों की करुण कथा महात्मा गाँधी को सुनाई। गाँधीजी ने वचन दिया कि यदि मेवाड़ सरकार ने न्याय नहीं किया तो वह स्वयं बिजोलिया सत्याग्रह का संचालन करेंगे। महात्मा गाँधी ने किसानों की शिकायत दूर करने के लिए एक पत्र महाराणा को लिखा, पर कोई हल नहीं निकला। विजय सिंह पथिक ने बम्बई यात्रा के समय गाँधीजी की पहल पर यह निश्चय किया गया कि वर्धा से ‘राजस्थान केसरी’ नामक पत्र निकाला जाये। यह पत्र सारे देश में लोकप्रिय हो गया, परन्तु पथिक जी और जमनालाल बजाज की विचारधारा ने मेल नहीं खाया और वे वर्धा छोड़कर अजमेर चले गए। 1920 में पथिक जी के प्रयत्नों से अजमेर में ‘राजस्थान सेवा संघ’ की स्थापना हुई।

शीघ्र ही इस संस्था की शाखाएँ पूरे प्रदेश में खुल गईं। इस संस्था ने राजस्थान में कई जन आन्दोलनों का संचालन किया। अजमेर से ही पथिक जी ने एक नया पत्र ‘नवीन राजस्थान’ प्रकाशित किया। 1920 में पथिक जी अपने साथियों के साथ नागपुर अधिवेशन में शामिल हुए और बिजोलिया के किसानों की दुर्दशा और देशी राजाओं की निरंकुशता को दर्शाती हुई एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। गाँधीजी विजय सिंह पथिक के बिजोलिया आन्दोलन से प्रभावित तो हुए, परन्तु उनका रुख देशी राजाओं और सामन्तों के प्रति नरम ही बना रहा। कांग्रेस और गाँधीजी यह समझने में असफल रहे कि सामन्तवाद साम्राज्यवाद का ही एक स्तम्भ है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश के लिए साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के साथ-साथ सामन्तवाद विरोधी संघर्ष आवश्यक है। गाँधीजी ने अहमदाबाद अधिवेशन में बिजोलिया के किसानों को ‘हिजरत’ (क्षेत्र छोड़ देने) की सलाह दी। पथिक जी ने इसे अपनाने से इनकार कर दिया।

दूसरी ओर कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन शुरू करने से भी सरकार को स्थिति और बिगड़ने की भी आशंका होने लगी। अंतत: सरकार ने राजस्थान के ए.जी.जी. हालैण्ड को ‘बिजोलिया किसान पंचायत बोर्ड’ और ‘राजस्थान सेवा संघ’ से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। शीघ्र ही दोनों पक्षों में समझौता हो गया। किसानों की अनेक माँगें मान ली गईं। चौरासी में से पैंतीस लागतें माफ कर दी गईं। जुल्मी कारिन्दे बर्खास्त कर दिए गए और किसानों की अभूतपूर्व विजय हुई।

अखिल भारतीय किसान सभा (1936 ई.)

भारत में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है। दण्डी संन्यासी होने के बावजूद सहजानंद ने रोटी को ही भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया। उन्होंने किसानों को लेकर नारा भी दिया था।

‘जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनायेगा ये  भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वहीं चलायेगा’

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 11 अप्रैल, 1936 ई. को लखनऊ में किसान नेताओं ने की थी। 1923 ई. में ‘स्वामी सहजानंद सरस्वती’ ने ‘बिहार किसान सभा’ का गठन किया। जब 1934 में बिहार प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ तब स्वामी जी ने बढ़-चढ़कर राहत और पुनर्वास के काम में भाग लिया। किसानों को हक दिलाने के लिए संघर्ष को अपना लक्ष्य मान लिया था। जिसके बाद उन्होंने नारा दिया। ‘कैसे लोगे मालगुजारी, लठ हमारा जिन्दाबाद’ बाद में यहीं नारा किसान आंदोलन का सबसे प्रिय नारा बन गया।वे कहते थे- ‘अधिकार हम लड़ कर लेंगे और जमींदारी का खात्मा करके रहेंगे’उनका भाषण किसानों पर गहरा असर छोड़ता था। काफी कम समय में किसान आंदोलन पूरे बिहार में फैल गया। उस दौरान बड़ी संख्या में लोग स्वामी जी को सुनने आते थे। 1936 में कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई जिसमें उन्हें    पहला अध्यक्ष चुना गया।

देश के 6.3 करोड़ किसान कर्ज में, कौन देगा अन्नदाताओं के इन सवालों के जवाब? मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में किसान रैलियों में जुटने वाली भीड़ कांग्रेस की सभाओं में आने वाली भीड़ से कई गुना ज्यादा होती थी। उन्होंने किसान आंदोलन के संचालन के लिए पटना के समीप बिहटा में आश्रम भी स्थापित किया। वो सीताराम आश्रम आज भी है।उस दौरान सहजानन्द किसानों को शोषण मुक्त और जमींदारी प्रथा से आजादी दिलाना चाहते थे। किसाने के हक के लिए लड़ाई लड़ते हुए स्वामी जी 26 जून,1950 का निधन हो गया

1928 ई. में ‘आंध प्रान्तीय रैय्यत सभा’ की स्थापना एन.जी. रंगा ने की। उड़ीसा में मालती चैधरी ने ‘उत्तकल प्रान्तीय किसान सभा’ की स्थापना की। बंगाल में ‘टेंनेंसी एक्ट’ को लेकर अकरम ख़ाँ, अब्दुर्रहीम, फ़जलुलहक, के प्रयासों से 1929 ई. में ‘कृषक प्रजा पार्टी’ की स्थापना हुई।

अप्रैल, 1935 ई. में संयुक्त प्रान्त में ‘किसान संघ’ की स्थापना हुई। इसी वर्ष एन.जी. रंगा एवं अन्य किसान नेताओं ने सभी प्रान्तीय किसान सभाओं को मिलाकर एक ‘अखिल भारतीय किसान संगठन’ बनाने की योजना बनाई। अपने इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए किसान नेताओं ने 11 अप्रैल, 1936 ई. को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना की। स्वामी सहजानन्द सरस्वती इसके अध्यक्ष तथा प्रो. एन.जी. रंगा इसके महासचिव चुने गए। अखिल भारतीय किसान सभा को जवाहर लाल नेहरू ने भी सम्बोधित किया था। इस अधिवेशन में 1 सितम्बर, 1936 ई. को ‘किसान दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया गया। फ़ैजपुर में कांग्रेस सम्मेलन के समय उसके समानान्तर होने वाले अखिल भारतीय किसान आन्दोलन की अध्यक्षता एन.जी. रंगा ने की।

इस सम्मेलन में भू-राजस्व की दर 50 प्रतिशत कम करने तथा किसान संगठनों को मान्यता देने की माँग रखी गई। इस सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले नेताओं में जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्र देव तथा कमल सरकार प्रमुख थे। किसान आन्दोलन को गति प्रदान करने तथा सक्रिय कार्यकर्ताओं को शिक्षित करने के उद्देश्य से 1938 ई. में आंध्र प्रदेश के गण्टूर ज़िले मे निदुबोल में पहला ‘भारतीय किसान स्कूल’ खोला गया।

चम्पारन सत्याग्रह गांधीजी के नेतृत्व में बिहार के चम्पारण जिले में सन् 1917 में हुआ। गांधीजी के नेतृत्व में भारत में किया गया यह पहला सत्याग्रह था। अंग्रेज़ बाग़ान मालिकों ने चम्पारन के किसानों से एक अनुबन्ध करा लिया था, जिसमें उन्हें नील की खेती करना अनिवार्य था। नील के बाज़ार में गिरावट आने से कारखाने बन्द होने लगे। अंग्रेज़ों ने किसानों की मजबूरी का लाभ उठाकर लगान बढ़ा दिया। इसी के फलस्वरूप विद्रोह प्रारम्भ हो गया। महात्मा गाँधी ने अंग्रेज़ों के इस अत्याचार से चम्पारन के किसानों का उद्धार कराया। इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार वालों के लिए वे देव तुत्य बन गये। यहाँ उनके साथ आन्दोलन में प्रमुख थे- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिन्हा, जनकधारी प्रसाद और ब्रजकिशोर प्रसाद।

चम्पारन के किसानों से अंग्रेज़ बाग़ान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था। इस अनुबंध के अंतर्गत किसानों को ज़मीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे ‘तिनकठिया पद्धति’ कहते थे। 19वीं शताब्दी के अन्त में रासायनिक रगों की खोज और उनके प्रचलन से नील के बाज़ार में गिरावट आने लगी, जिससे नील बाग़ान के मालिक अपने कारखाने बंद करने लगे। किसान भी नील की खेती से छुटकारा पाना चाहते थे। गोरे बाग़ान मालिकों ने किसानों की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर अनुबंध से मुक्त करने के लिए लगान को मनमाने ढंग से बढ़ा दिया, जिसके परिणामस्वरूप विद्रोह शुरू हुआ।

‘तिनकठिया प्रणाली’ की समाप्ति

1917 ई. में चम्पारन के राजकुमार शुक्ल ने सत्याग्रह की धमकी दी, जिससे प्रशासन ने अपना आदेश वापस ले लिया। चम्पारन में गाँधी जी द्वारा सत्याग्रह का सर्वप्रथम प्रयोग करने का प्रयास किया गया। चम्पारन सत्याग्रह में गाँधी जी के साथ अन्य नेताओं में राजेन्द्र प्रसाद, ब्रजकिशोर, महादेव देसाई, नरहरि पारिख तथा जे. बी. कृपलानी थे। इस आन्दोलन में गाँधी जी के नेतृत्व में किसानों की एकजुटता को देखते हुए सरकार ने मामले की जाँच की।

जुलाई, 1917 ई. में ‘चम्पारण एग्रेरियन कमेटी’ का गठन किया गया। गाँधी जी भी इसके सदस्य थे। इस कमेटी के प्रतिवेदन पर ‘तिनकठिया प्रणाली’ को समाप्त कर दिया तथा किसानों से अवैध रूप से वसूले गए धन का 25 प्रतिशत वापस कर दिया गया। 1919 ई. में ‘चम्पारण एग्रेरियन अधिनियम’ पारित किया गया, जिससे किसानों की स्थिति में सुधार हुआ।

15 अप्रैल, 1917 को राजकुमार शुक्ल जैसे एक अनाम-से आदमी के साथ मोहनदास करमचंद गांधी नाम का आदमी चंपारण, मोतिहारी पहुंचा था। बाबू गोरख प्रसाद के घर पर उन्हें ठहराया गया। बिहार के उत्तर-पश्चिम में स्थित चंपारण वह इलाका है जहां सत्याग्रह की नींव पड़ी। नील की खेती के नाम पर अंग्रेजी शासन द्वारा किसानों के शोषण के खिलाफ यहां गांधी के नेतृत्व में 1917 में सत्याग्रह आंदोलन चला था।

महात्मा गांधी का 1917 का चंपारण सत्याग्रह न सिर्फ भारतीय इतिहास बल्कि विश्व इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती दी थी। वे 10 अप्रैल, 1917 को जब बिहार आए तो उनका एक मात्र मकसद चंपारण के किसानों की समस्याओं को समझना, उसका निदान और नील के धब्बों को मिटाना था। एक स्थानीय पीड़ित किसान राजकुमार शुक्ल ने कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन (1916) में अंग्रेजों द्वारा जबरन नील की खेती कराए जाने के संदर्भ में शिकायत की थी। शुक्ल का आग्रह था कि गांधीजी इस आंदोलन का नेतृत्व करें। गांधीजी ने इस समस्या को न सिर्फ गंभीरतापूर्वक समझा, बल्कि इस दिशा में आगे भी बढ़े। बिहार में चंपारण जिले को ये सौभाग्य प्राप्त है कि दक्षिण अफ़्रीका से वापस आकर महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह आन्दोलन का प्रारम्भ यहीं से किया। चंपारण सत्याग्रह में गाँधी जी को सफलता भी प्राप्त हुई। शांतिपूर्ण जनविरोध के माध्यम से सरकार को सीमित मांगें स्वीकार करने पर सहमत कर लेना एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। सत्याग्रह का भारत के राष्ट्रीय स्तर पर यह पहला प्रयोग इस लिहाज से काफी सफल रहा। इसके बाद नील की खेती जमींदारों के लिए लाभदायक नहीं रही और शीघ्र ही चंपारण से नील कोठियों के मालिकों का पलायन प्रारंभ हो गया।

खेड़ा सत्याग्रह राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा प्रारम्भ किया गया था। ‘चम्पारन सत्याग्रह’ के बाद गाँधीजी ने 1918 ई. में खेड़ा (गुजरात) के किसानों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन शुरू किया। खेड़ा में गाँधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक ‘किसान सत्याग्रह’ की शुरुआत की थी। खेड़ा सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा ज़िले में किसानों का अंग्रेज़ सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक सत्याग्रह (आन्दोलन) था। यह महात्मा गांधी की प्रेरणा से वल्लभ भाई पटेल एवं अन्य नेताओं की अगुवाई में हुआ था।

खेड़ा के कुनबी-पाटीदार किसानों ने 1918 ई. में अंग्रेज़ सरकार से लगान में राहत की माँग की थी, क्योंकि गुजरात की पूरे वर्ष की फ़सल मारी गई थी। किसानों की दृष्टि में फ़सल चौथाई भी नहीं हुई थी। ऐसी स्थिति को देखते हुए लगान की माफी होनी चाहिए थी, पर सरकारी अधिकारी किसानों की इस बात को सुनने को तैयार नहीं थे। किसानों की जब सारी प्रार्थनाएँ निष्फल हो गईं, तब महात्मा गाँधी ने 22 मार्च, 1918 ई. में ‘खेड़ा आन्दोलन’ की घोषणा की और उसकी बागडोर सम्भाल ली।

गाँधीजी की अपील

इस समय गाँधीजी ने लोगों से स्वयं सेवक और कार्यकर्ता बनने की अपील की। गाँधीजी की अपील पर सरदार वल्लभभाई पटेल अपनी अच्छी ख़ासी चलती हुई वकालत छोड़ कर सामने आए। यह उनके सार्वजनिक जीवन का श्रीगणेश था। उन्होंने गाँव-गाँव घूम-घूम कर किसानों से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर कराया कि वे अपने को झूठा कहलाने और स्वाभिमान को नष्ट कर जबर्दस्ती बढ़ाया हुआ कर देने की अपेक्षा अपनी भूमि को जब्त कराने के लिये तैयार हैं।

अंग्रेज़ सरकार की ओर से कर की अदायगी के लिए किसानों के मवेशी तथा अन्य वस्तुएँ कुर्क की जाने लगीं। किसान अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहे। उन्हें अधिक दृढ़ बनाने के लिए महात्मा गाँधी ने किसानों से कहा कि “जो खेत बेजा कुर्क कर लिए गए हैं, उसकी फ़सल काट कर ले आएँ”। गाँधीजी के इस आदेश का पालन करने मोहनलाल पंड्या आगे बढ़े और वे एक खेत से प्याज की फ़सल उखाड़ लाए। इस कार्य में कुछ अन्य किसानों ने भी उनकी सहायता की। वे सभी पकड़े गए, मुक़दमा चला और उन्हें सजा हुई। इस प्रकार किसानों का यह ‘सत्याग्रह’ चल निकला और सफलता की ओर बढ़ने लगा।

यह सत्याग्रह गाँधीजी का पहला आन्दोलन था। सरकार को अपनी भूल का अनुभव हुआ, पर उसे वह खुल कर स्वीकार नहीं करना चाहती थी। अत: उसने बिना कोई सार्वजनिक घोषणा किए ही ग़रीब किसानों से लगान की वसूली बंद कर दी। सरकार ने यह कार्य बहुत देर से और बेमन से किया और यह प्रयत्न किया कि किसानों को यह अनुभव न होने पाए कि सरकार ने किसानों के सत्याग्रह से झुककर किसी प्रकार का कोई समझौता किया है। इससे किसानों को अधिक लाभ तो नहीं हुआ, पर उनकी नैतिक विजय हो चुकी थी।

‘खेड़ा सत्याग्रह’ के फलस्वरूप गुजरात के जनजीवन में एक नया तेज और उत्साह उत्पन्न हुआ और आत्मविश्वास जागा। यह सत्याग्रह यद्यपि साधारण-सा था, तथापि भारतीय चेतना के इतिहास में इसका महत्व ‘चंपारन सत्याग्रह’ से कम नहीं है। गाँधीजी के सत्याग्रह के आगे विवश होकर ब्रिटिश अंग्रेज़ सरकार ने यह आदेश दिया कि वसूली समर्थ किसानों से ही की जाय।

बारदोली सत्याग्रह (1920 ई.)

बारदोली सत्याग्रह ‘भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन’ का सबसे संगठित, व्यापक एवं सफल आन्दोलन रहा है। यह आन्दोलन सरकार द्वारा बढ़ाये गए 30 प्रतिशत कर के विरोध में चलाया गया था। बारदोली के ‘मेड़ता बन्धुओं’ (कल्याण जी और कुंवर जी) तथा दयाल जी ने किसानों के समर्थन में 1922 ई. से आन्दोलन चलाया। बाद में इसका नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया। सूरत (गुजरात) के बारदोली तालुके में 1920 ई. में किसानों द्वारा ‘लगान’ न अदायगी का आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन में केवल ‘कुनबी-पाटीदार’ जातियों के भू-स्वामी किसानों ने ही नहीं, बल्कि ‘कालिपराज’ (काले लोग) जनजाति के लोगों ने भी हिस्सा लिया। सरकार द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकरी ब्रूमफ़ील्ड और राजस्व अधिकारी मैक्सवेल ने मामले की जाँच की और बढ़ोत्तरी को ग़लत ठहरीते हुए इसे घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया। आन्दोलन के सफल होने पर वहाँ की महिलाओं ने पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की।

गाँधी जी का योगदान

137 गांवों एवं 87,000 जनसंख्या वाले बारदोली में किसानों की मुख्य जाति ‘कुनबी-पाटीदार’ 1908 ई. से कुंवर जी एवं कल्याण जी मेहता के नेतृत्व में संगठित होने लगी थी। इस संगठन ने ‘पाटीदार युवक मंडल’ एवं ‘पटेल बन्धु’ नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। पाटीदार किसानों की ज़मीन ‘दुबला आदिवासी’ जोता करते थे, जिन्हें ‘कालिपराज’ भी कहा जाता था। बारदोली सत्याग्रह के समय ‘कालिपराज’ आदिवासियों का नाम गांधी जी ने बदलकर ‘रानीपराज’ रख दिया। किसान संघर्ष एवं राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष के अन्तः संबंधों की व्याख्या बारदोली किसान संघर्ष के संदर्भ में करते हुए गांधी जी ने कहा कि ‘बारदोली संघर्ष चाहे जो कुछ भी हो, यह राजस्व प्राप्ति का संघर्ष नहीं है। लेकिन इस तरह का हर संघर्ष, हर कोशिश हमें स्वराज के क़रीब पहुँचा रही है और हमें स्वराज की मंज़िल तक पहुँचाने में शायद ये संघर्ष सीधे स्वराज के लिए संघर्ष से कहीं ज्यादा सहायक सिद्ध हो सकते हैं।’

बारदोली क्षेत्र में कालिपराज जनजाति को ‘हाली पद्धति’ के अन्तर्गत उच्च जातियों के यहाँ पुश्तैनी मज़दूर के रूप में कार्य करना होता था। गाँधी जी की सलाह पर बारदोली के कार्यकताओं द्वारा कालिपराजों का सम्मेलन आयोजित होता था। 1927 ई. के इस सम्मेलन की अध्यक्षता गाँधी जी ने की तथा 1927 ई. में ही कालिपराजों के वार्षिक सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कालिपराओं को रानीपराज (बनवासी) की उपाधि दी। कांग्रेस ने अपने विरोध द्वारा लगान में की गयी 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी को अनुचित सिद्ध किया। बड़े पैमाने पर इसका विरोध हुआ। अन्त में इस सत्याग्रह को आंशिक सफलता प्राप्त हुई, जब 1927 ई. में सरकार ने कर को घटाकर 21.9 प्रतिशत करने की घोषण की।

वल्लभ भाई का नेतृत्व

4 फ़रवरी, 1928 ई. को वल्लभ भाई पटेल ने बारदोली किसान सत्याग्रह का नेतृत्व संभाला। सर्वप्रथम बढ़ी हुई लगान के विरुद्ध सरकार को पत्र लिखा गया, किन्तु सरकार द्वारा कुछ सकारात्मक उत्तर नहीं मिला। परिणामस्वरूप पटेल ने किसानों को संगठित किया तथा उन्हें लगान न अदा करने के लिए कहा। दूसरी तरफ़ कांग्रेस के नरमपंथी गुट ने ‘सर्वेण्ट्स ऑफ़ इण्डिया सोसाइटी’ के माध्यम से सरकार द्वारा किसानों की माँग की जाँच करवाने का अनुरोध किया। ‘बारदोली सत्याग्रह’ नाम से एक दैनिक पत्रिका निकाली गयी। बम्बई विधान परिषद के भारतीय नेताओं ने त्यागपत्र दे दिया। ब्रिटेन की संसद में भी बहस हुई। वायसराय लॉर्ड इरविन ने भी बम्बई के गर्वनर विल्सन को मामले को शीघ्र निपटाने का निर्देश दिया। उधर पटेल की गिरफ्तारी की सम्भावना को देखते हुए वैकल्पिक नेतृत्व के लिए 2 अगस्त, 1928 ई. को गाँधी जी बारदोली पहुँच गये।

महिलाओं ने भी इस आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें बम्बई की पारसी महिला मीठूबेन पेंटिट, भक्तिवा, मनीबेन पटेल, सुपुत्री शारदाबेन शाह और शादराशाह के नाम उल्लेखनीय हैं। पटेल से बारदोली के लोग प्रभावित हुए। इसी सत्याग्रह के दौरान पटेल को वहाँ की औरतों ने सरदार की उपाधि प्रदान की थी। सरकार ने ब्रूम फ़ील्ड और मैक्सवेल को बारदोली मामलें की जाँच करने का आदेश दिया। जाँच रिपोर्ट में बढ़ी हुई 30 प्रतिशत लगान को अवैध घोषित किया गया। अतः सरकार ने लगान घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया। इस प्रकार सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में बारदोली किसान आन्दोलन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। गाँधी जी ने इस सफलता पर कहा कि, “बारदोली संघर्ष चाहे जो कुछ भी हो, यह स्वराज्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष नहीं हैं, लेकिन इस तरह का हर संघर्ष हर कोशिश हमें स्वराज के क़रीब पहुँचा रही है”।

तेलंगाना का किसान आन्दोलन (1946-1951 ई.)

हैदराबाद रियासत में तेलंगाना में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह आन्दोलन शुरू हुआ। यहाँ पर किसानों से कम दाम पर अनाज की ज़बरन वसूली की जा रही थी, जिसके कारण उनके अन्दर एक आक्रोश उत्पन्न हुआ। इस आन्दोलन का तात्कालिक कारण ‘कम्युनिस्ट नेता’ कमरैया की पुलिस द्वारा हत्या कर देना था। किसानों ने पुलिस व ज़मींदारों पर हमला कर दिया तथा हैदराबाद रियासत को समाप्त कर भारत का अंग बनाने माँग की। तेलंगाना कृषक आन्दोलन भारतीय इतिहास के सबसे लम्बे छापामार कृषक युद्ध का साक्षी बना।

किसान परिवार : कर्ज माफी

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट बताती है कि कर्ज के बोझ तले किसानों में खुदकुशी की दर लगातार बढ़ रही है। 2005 से 2015 के बीच 10 साल के आंकड़ों पर नजर डाला जाए तो देश में हर एक लाख की आबादी पर 1।4 से 1।8 किसान खुदकुशी कर रहे हैं। महाराष्ट्र में आंदोलन कर रहे किसानों की मांग है कि बीते साल सरकार ने कर्ज माफी का जो वादा उनसे किया था उसे पूरी तरह से लागू किया जाए। बिना किसी शर्त के सभी किसानों का कर्ज माफ किया जाए। बिजली बिल भी माफ किया जाए।साथ ही किसानों का कहना है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए और गरीब और मझौले किसानों के कर्ज पूरी तरह से माफ किए जाएं।

देश में 9 करोड़ किसान परिवार हैं जिसमें 6.3 करोड़ परिवार कर्ज में डूबा हुआ है। कर्ज में डूबने के कारण 1995 के बाद से अब तक करीब 4 लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं, इसमें खुदकुशी करने वाले करीब 76 हजार किसान अकेले महाराष्ट्र से हैं। खेती से जुड़ी सबसे ज्यादा समस्याएं इसी राज्य से हैं। महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में भी किसान खुदकुशी करते रहे हैं। 2017 में इन राज्यों में किसानों ने सबसे ज्यादा खुदकुशी की। देश की राजनीति में किसानों की अहम भूमिका रहती है। यहां करीब 70 फीसदी लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से खेती से जुड़े हैं। अमूमन हर चुनाव के पहले राजनीतिक दल किसानों की कर्ज माफी की बात करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद उस पर कुछ खास ध्यान नहीं देते जिससे किसान सड़क पर आंदोलन करने को मजबूर होते हैं।

किसानों की एक और बड़ी मांग है कि आदिवासी वनभूमि के आवंटन से जुड़ी समस्याओं का निपटारा किया जाए जिससे आदिवासी किसानों को उनकी जमीनों का मालिकाना हक मिल सके।ये चंद अहम मांगें है किसानों की, इसके अलावा उनकी कई और मांगें भी है जिसे पूरा किया गया तो उनकी स्थिति में सुधार आ सकती है। अमूमन हर सरकार खुद को किसानों की हितैषी बताती है, लेकिन एक अंतराल के बाद किसान सड़क पर उतरने को मजबूर होते रहे हैं। महाराष्ट्र में फिर से हजारों की संख्या में किसान सड़क पर उतरे हैं, हमारे अन्नदाताओं की मांग इतनी नाजायज भी नहीं है कि सरकार के पास इसको लेकर जवाब देते न बने। किसानों के अस्तित्व से जुड़े अहम सवालों का जवाब सरकार को देना चाहिए, और कोशिश करनी चाहिए कि उन्हें बार-बार सड़क पर उतरने को मजबूर न होना पड़े।

किसान एवं कृषि: मुख्य समस्याएं एवं समाधान 

भारत मे किसानों की आर्थिक हालात लगातार बिगड़ती जा रही है। सवाल यह कि क्या हम किसानों की समस्याओं का सही कारण नहीं खोज पाए या खोजना ही नहीं चाहते?

सरकारी आकड़ों के अनुसार, देश में किसानों की औसत मासिक आय 6426 रुपये है। जिसमें खेती से प्राप्त होनेवाली आय केवल 3081 रुपये प्रतिमाह है। यह 17 राज्यों में केवल 1700 रुपये मात्र है। हर किसान पर औसतन 47000 रुपयों का कर्ज है। लगभग 90 प्रतिशत किसान और खेत मजदूर गरीबी का जीवन जी रहे हैं। जो किसान केवल खेती पर निर्भर हैं उनके लिये दो वक्त की रोटी पाना भी संभव नहीं है। खेती के काम हो, बीमारी हो, बच्चों की शादी हो या कोई अन्य प्रासंगिक कार्य किसान को हर बार कर्ज लेने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नही बचता। यह जानते हुए भी कि उसकी आय कर्ज का ब्याज लौटाने के लिये भी पर्याप्त नहीं है।

राजनेता और नौकरशाह अपना वेतन तो आवश्यकता और योग्यता से कई गुना अधिक बढ़ा लेते हैं लेकिन किसान के लिए उसे दिन के 8 घंटे कठोर परिश्रम के बाद भी मेहनत का उचित मूल्य न मिले ऐसी व्यवस्था बनाये रखना चाहते हैं। पूरे देश के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर आकलन करें तो खेती में काम के दिन के लिए केवल औसत 92 रुपये मजदूरी मिलती है। यह मजदूरी 365 दिनों के लिये प्रतिदिन 60 रुपये के आसपास पड़ती है। किसान की कुल मजदूरी से किराये की मजदूरी कम करने पर दिन की मजदूरी 30 रुपये से कम पड़ती है। मालिक की हैसियत से तो किसान को कुछ मिलता ही नहीं, खेती में काम के लिए न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के आकड़े भी इसी की पुष्टि करते हैं। केवल खेती पर निर्भर किसान परिवार का जीवन संभव नहीं है।

मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि बाजार में विकृति पैदा न हो इसलिए वह किसान को फसल का उत्पादन खर्च पर आधारित दाम नहीं दे सकती। महंगाई न बढे, उद्योगपतियों को सस्ते कृषि उत्पाद मिले, अंतरराष्ट्रीय बाजार में आयात निर्यात स्पर्धा बनी रहे, विश्व व्यापार संगठन के शर्तो को निभा सके इसलिए वह कृषि फसलों की कीमत नहीं दे सकती। स्पष्ट है कि अन्य सभी को फायदा पहुंचाने और बाजार में विकृति पैदा न हो इसलिए किसान का शोषण किया जा रहा है।

बाजार व्यवस्था खुद एक लूट की व्यवस्था है। जो स्पर्धा के नाम पर बलवान को दुर्बल की लूट करने की स्वीकृति के सिद्धांत पर खड़ी है। बाजार में विकृति पैदा न होने देने का अर्थ किसान को लूटने की व्यवस्था बनाए रखना है। जब तक किसान बाजार नामक लूट की व्यवस्था में खड़ा है उसे कभी न्याय नहीं मिल सकता। बाजार में किसान हमेशा कमजोर ही रहता है।एकसाथ कृषि उत्पादन बाजार में आना, मांग से अधिक उत्पादन की उपलब्धता, स्टोरेज का अभाव, कर्ज वापसी का दबाव, जीविका के लिए धन की आवश्यकता आदि सभी कारणों से किसान बाजार में कमजोर के हैसियत में ही खड़ा होता है।

किसान को लूटने और उसे गुलाम बनाये रखने के लिये नित नई योजनाएं बनाई जा रही हैं। खेती से जुड़ी हर गतिविधियों में उसको लूटा जा रहा है। उनके लिए किसान एक गुलाम है जिसे वह उतना ही देना चाहते हैं जिससे वह पेट भर सके और मजबूर होकर खेती करता रहे। इसी के लिए नयीं कृषि नीतियां और आर्थिक नीतियां बनाई गई हैं और देश के नीति निर्धारक इसे बनाए रखना चाहते हैं। जब तक सत्ता में बैठे लोग किसान को मनुष्य नहीं सस्ते मजदूर के हैसियत से देखते हैं और उसके तहत नीतियां बनाते हैं तब तक न ही किसान अपने बल पर कभी खड़ा हो पाएगा और न ही उसे कभी जीने का अधिकार प्राप्त हो सकता है।

किसान का मुख्य संकट आर्थिक है। किसानों की समस्याओं का समाधान केवल उपज का थोड़ा मूल्य बढ़ाकर नहीं होगा बल्कि उसे किसान के श्रम का शोषण, लागत वस्तु के खरीद में हो रही लूट, कृषि उत्पाद बेचते समय व्यापारी, दलालों द्वारा खरीद में या सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद में की जा रही लूट, बैंकों, बीमा कंपनियों द्वारा की जा रही लूट इन सबको बंद करना होगा। जहां जहां उसका शोषण किया जा रहा है वहां वहां लूट के हर रास्ते बंद करने होंगे और अपने अधिकार को सुरक्षित रखने वाली व्यवस्था बनानी होगी। इसके साथ ही किसानों को भी कृषि मे थोडा बदलाव और प्रौद्योगिकी की ओर मुखातिब होना होगा।

समाधान हेतु एक नवीन विचार

कृषि भारत की नींव है लेकिन वही नींव आज सबसे कमजोर है और इसका एक कारण नवीनीकरण एंव प्रोद्योगिकी को न अपनाना है। भारत में ज्यादातर किसान ऐसे होंगे जिन्होंने कभी मिट्टी की जाँच नहीं करवाई जो कि कृषि की शुरुआत का पहला कदम है। कोई भी समस्या तब तक हल नहीं की जा सकती जब तक उस समस्या के कारण का सही तरीके से अध्ययन न कर लिए जाये।

कृषि में प्रोद्योगिकी न अपनाने के कारण

आज से करीब 8-10 वर्ष पहले ज्यादातर क्षेत्र के अधिकतर किसान सीधे पाइप के माध्यम से सिंचाई करते थे एंव उनको फव्वारा तकनीक का ज्ञान होते हुए भी वे उनका उपयोग नहीं करते थे। जब हमने स्वयं ग्रामीण इलाकों मे जाकर इसकी पडताल की तो पता लगा। हमने पूछा कि वे फव्वारा तकनीक का ज्ञान होते हुए भी इसका उपयोग क्यों नहीं करते जबकि इससे पानी की बचत होती है एंव यह तकनीक उनकी सबसे बड़ी समस्या का हल हो सकता है तो पाया कि क्षेत्र के ज्यादातर किसान इस तकनीक का उपयोग इसलिए नहीं करते थे किसानों को इस तकनीक का पूरा ज्ञान एंव उपयोगिता पता नहीं थी।

मुख्य रूप से कृषि, छोटे एंव मध्यमवर्ग के किसानों द्वारा की जाती है जिनकी आमदनी का मुख्य स्त्रोत कृषि है। किसानों की आय निरंतर नहीं होती है एंव किसान के ज्यादात्तर खर्चे उधार एंव ऋण के आधार पर चलते है और जब फसल बिकती है तो ज्यादातर कमाई ऋण चुकाने में चली जाती है। किसान के पास वित की कमी होती है इसलिए किसान कोई भी नयी तकनीक का प्रयोग तब तक नहीं कर सकता जब तक उसकी सफलता की गारंटी न हो।

हम लोगों के एक संक्षिप्त प्रयास से कुछ वर्षों बाद कुछ एक क्षेत्र के किसान फव्वारा तकनीक अपनाने लग गए और आज ज्यादातर किसान फव्वारा तकनीक से सिंचाई करने लगे जब हम लोगों ने इस बात का पता लगाया की अब ऐसा क्या हो गया की सभी इस तकनीक का प्रयोग कर रहे है तो पाया कि क्षेत्र के कुछ समर्थ किसानों ने सबसे पहले इस तकनीक को अपनाया और जब क्षेत्र के अन्य किसानों ने उन समर्थ किसानों के खेतों में इस तकनीक को देखा एंव इसकी उपयोगिता को समझा तो उन्होंने भी इस तकनीक को अपनाना शुरू कर दिया।

इस बात से यह निष्कर्ष निकलता है कि किसान के पास वित्त की कमी होती है एंव इसलिए वह नयी तकनीकों एंव परिवर्तनों को तब ही अपना सकता है

जब किसान को नयी तकनीकों का पूरा ज्ञान हो एंव उसने इस तकनीको के व्यावहारिक उपयोग एंव फायदों को अन्य कृषि फार्म पर देखा हो।

ऐसी तकनीकें कम लागत पर उपलब्ध हो एंव कृषि उत्पादन को बढ़ा सकें।

ऐसी तकनीकों से सम्बंधित समस्याओं का समाधान उसी क्षेत्र में मौजूद हो।

समाधान 

कृषि विज्ञान फार्म मॉडल (कृषि को प्रोद्योगिकी से जोड़ने की तकनीक)

कृषि विज्ञान फार्म मॉडल एक ऐसी तकनीक है जिससे किसानों को नयी कृषि प्रोद्योगिकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इस तकनीक के अंतर्गत प्रत्येक क्षेत्र (500 से 1000 कृषि फार्म) में एक ऐसा कृषि विज्ञान फार्म स्थापित किया जाये जिसमें नयी तकनीकों के आधार पर खेती हो। कृषि विज्ञान फार्म एक कृषि फार्म ही है जिसमें उस क्षेत्र के जलवायु एंव भोगौलिक परिस्थितियों के अनुसार नयी तकनीकों के आधार पर कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में उच्च स्तरीय खेती की जाएगी। इस फार्म में उस क्षेत्र के किसानों को नयी प्रोद्योगिकी के बारे में व्यावहारिक ज्ञान दिया जायेगा एंव उनकी समस्याओं का समाधान किया जायेगा।

कृषि विज्ञान फार्म के कार्य

नई एंव व्यावहारिक कृषि तकनीकों द्वारा उच्च स्तरीय खेती करना ताकि क्षेत्र के किसान इस तकनीकों की उपयोगिता समझें एंव उसका उपयोग कर सकें।

  1. किसानों को शिक्षित करना एंव उन्हें व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करना।
  2. मिटटी एंव पानी की जांच जैसी मूलभूत सविधाएं उपलब्ध करवाना।
  3. किसानों की समस्याओं का समाधान करना एंव उचित मार्गदर्शन करना।
  4. जल सरंक्षण तकनीकों का उपयोग करना एंव किसानों को इसके उपयोग के लिए प्रोत्साहित करना।
  5. किसानों को विभिन्न योजनाओं एंव सब्सिडी के बारे में शिक्षित करना।
  6. किसानों के वित्त आवश्यकताओं के पूर्ती हेतु विभिन्न सरकारी एंव गैर सरकारी योजनाओं की जानकारी देना एंव उचित मार्गदर्शन प्रदान करना।
  7. किसानों को कृषि उत्पादों के भण्डारण तकनीकों के बारे में बताना।
  8. यह सुनिश्चित करना कि क्षेत्र के किसानों को कृषि उत्पादों का सही मूल्य मिले।
  9. सही खाद, बीज एंव कीटनाशकों की जानकारी प्रदान करना और इनकी उपलब्धता को सुनिश्चित करना।
  10. क्षेत्र में पर्यावरण सुरक्षा को सुनिश्चित करना एंव पेड़ लगाना।
  11. किसानों को मौसम एंव बारिश सम्बन्धी सूचनाएं उपलब्ध करवाना।
  12. सरकार के समक्ष किसानों का प्रतिनिधित्व करना एंव किसानों की समस्याओं से अवगत करवाना।
  13. सरकार के लिए क्षेत्र से सम्बंधित किसानों एंव कृषि उत्पादनों का डाटा रखना।

कृषि विज्ञान फार्म का मूलभूत ढांचा

कृषि विज्ञान फार्म एक ऐसा विचार है जिसमें कृषि एंव पर्यावरण से सम्बंधित सभी पक्षों जैसे किसान, कृषि वैज्ञानिक, कृषि पाठ्यक्रम के छात्र, कृषि विभाग, वन विभाग, जल सरंक्षण विभाग, कृषि यन्त्र कम्पनियाँ, खाद एंव बीज उत्पादक, कृषि उत्पाद व्यापारी, किसान संघ, आईआईटी, एनजीओ एंव अन्य संस्थाओं की भागीदारी आवश्यक है।कृषि विज्ञान फार्म की स्थापना दो तरह से की जा सकती है- या तो स्वंतंत्र रूप से प्रत्येक क्षेत्र में इसकी स्थापना की जाये अथवा प्रत्येक क्षेत्र के वन विभाग, जल सरंक्षण विभाग, कृषि सहायता केंद्र एंव ऐसे ही पर्यावरण से सम्बंधित सभी विभागों को मिलाकरएक कृषि विज्ञान फार्म बना दिया जाये।

कृषि विज्ञान फार्म मुख्य रूप से एक विशेष क्षेत्र में कृषि वैज्ञानिकों, कृषि विभाग के अधिकारीयों, वन विभाग के अधिकारीयों की देखरेख में कार्य करेगा जिसका प्रमुख लक्ष्य उस क्षेत्र की कृषि व पर्यावरण को व्यावहारिक ज्ञान के द्वारा सुदृढ बनाना एंव किसानों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना होगा।वर्ष में दो बार कृषि विज्ञान फार्म एंव उस क्षेत्र की कृषि ऑडिट होगी जिसमे यह देखा जायेगा कि उस क्षेत्र में कितनी उन्नति हुई है एंव इसी के आधार पर उचित कार्यवाही की जाएगी।कृषि विज्ञान केंद्र के लिए राष्ट्र स्तर पर एक संस्थान बने जो देश के सभी कृषि विज्ञान फार्म को नियंत्रित करेगा।

कैसे कृषि विज्ञान फार्म, भारत की कृषि को नयी ऊंचाइयों तक ले जा सकते है

कृषि विज्ञान फार्म एक उच्चस्तरीय कृषि फार्म होगा जिसमे सर्वोतम तकनीकों से कृषि की जाएगी ताकि उच्च स्तरीय गुणवता के उत्पादन के साथ साथ ज्यादा से ज्यादा लाभ हो सके। इस कृषि फार्म से उस क्षेत्र के किसानों को व्यावहारिक ज्ञान एंव जानकारी मिलेगी जिससे वे नयी तकनीकों का प्रयोग करेंगे। साथ ही साथ किसानों की समस्यों का समाधान भी होगा जिससे किसानों को अधिक लाभ होगा। कृषि विज्ञानं फार्म विभाग कृषि मंत्रालय को किसानों की समस्याओं एंव विभिन्न योजनाओं की कमियों के बारे में जानकारी देगा जिससे ऐसी योजनायें बनेगी जो किसानों के लिए वाकई उपयोगी हो। कृषि विज्ञान फार्म प्रोद्योगिकी को Lab से Land तक पहुँचाने में कामयाब होगा जिससे किसान per drop more crop तकनीक को अपना लेंगे।अगर सही तरीके से कृषि विज्ञान फार्म की स्थापना एंव क्रियान्वयन किया जाये तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के पढ़े लिखे युवा कृषि की ओर वापसी करेंगे।

स्वामीनाथन रिपोर्ट: किसान हित रक्षक- प्रमुख सिफारिशें

एम एस स्वामिनाथन

स्वामीनाथन
स्वामीनाथन

पौधों के जेनेटिक वैज्ञानिक हैं जिन्हें भारत की हरित क्रांति का जनक माना जाता है। उन्हें विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1972 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। ‘हरित क्रांति’ कार्यक्रम के तहत ज़्यादा उपज देने वाले गेहूं और चावल के बीज ग़रीब किसानों के खेतों में लगाए गए थे। इस क्रांति ने भारत को दुनिया में खाद्यान्न की सर्वाधिक कमी वाले देश के कलंक से उबारकर 25 वर्ष से कम समय में आत्मनिर्भर बना दिया था। उस समय से भारत के कृषि पुनर्जागरण ने स्वामीनाथन को ‘कृषि क्रांति आंदोलन’ के वैज्ञानिक नेता के रूप में ख्याति दिलाई।

उनके द्वारा सदाबाहर क्रांति की ओर उन्मुख अवलंबनीय कृषि की वकालत ने उन्हें अवलंबनीय खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में विश्व नेता का दर्जा दिलाया। एम। एस। स्वामीनाथन को ‘विज्ञान एवं अभियांत्रिकी’ के क्षेत्र में ‘भारत सरकार’ द्वारा सन 1967 में ‘पद्म श्री’, 1972 में ‘पद्म भूषण’ और 1989 में ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया था। भारत में कृषि क्षेत्र में हो रहे सतत विकास में स्वामीनाथन में मुख्य भूमिका निभाई है। विशेष तौर पे उन्होंने अनाज की सुरक्षा और अन्न संवर्धन की और ज्यादा ध्यान दिया और उनके इसी कार्य ने आगे चलके एक क्रांति का रूप धारण कर लिया जिसे हरित क्रांति का नाम दिया गया था।

1972 से 1979 तक वे इंडियन कौंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च के डायरेक्टर थे। और 1979 से 1980 तक वे मिनिस्ट्री ऑफ़ एग्रीकल्चर फ्रॉम के प्रिंसिपल सेक्रेटरी भी रहे। 1982 से 1988 तक उन्होंने जनरल डायरेक्टर के पद पर रहते हुए इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट की सेवा भी की और बाद में 1988 में इंटरनेशनल यूनियन फॉर कान्सर्वेशन ऑफ़ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेज के प्रेसिडेंट भी बने। 1999 में टाइम पत्रिका ने उन्हें 20 वी सदी के सबसे प्रभावशाली लोगो की सूचि में भी शामिल किया।

किसानों की भलाई की बात सामने आते ही सबसे पहले स्वामीनाथन रिपोर्ट सभी के जहन में आती है। किसान संगठन हर बार स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की मांग करते रहे हैं। यहां समझें आखिर क्या थी वह स्वामीनाथन रिपोर्ट….

प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन को देश में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है। स्वामीनाथन जेनेटिक वैज्ञानिक हैं। तमिलनाडु के रहने वाले इन वैज्ञानिक ने 1966 में मेक्सिको के बीजों को पंजाब की घरेलू किस्मों के साथ मिश्रित करके उच्च उत्पादकता वाले गेहूं के संकर बीज विकिसित किए। यूपीए सरकार ने किसानों की स्थिति का जायजा लेने के लिए एक आयोग का गठन किया जिसे स्वामीनाथन आयोग कहा गया।

तो बदल जाती किसानों की हालत

दरअसल, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को आज तक लागू नहीं किया जा सका। कहा जाता है कि अगर इस रिपोर्ट को लागू कर दिया जाए तो किसानों की तकदीर बदल जाएगी। अनाज की आपूर्ति को भरोसेमंद बनाने और किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने के मकसद से 18 नवंबर 2004 को केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग ने पांच रिपोर्ट सौंपी थीं।

भूमि सुधार की अनुशंसा

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में भूमि सुधारों को बढ़ाने पर जोर दिया गया। अतिरिक्त और बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने का हक देना आदि है।

आत्महत्या रोकने की कोशिश

आयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने और वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। यदि इसे लागू किया जाए तो किसानों की स्थिति में काफी सुधार की संभावना है।

 

तो बढ़ जाती किसानों की आय

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश भी की गई है ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं, यही इसका मकसद है। किसानों की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछेक नकदी फसलों तक सीमित न रहें, इस लक्ष्य से ग्रामीण ज्ञान केंद्र और बाजार का दखल स्कीम भी लांच करने की सिफारिश की गई है।

कांग्रेस सरकार ने कर लिया था स्वीकार!

किसान संगठनों ने कई बार इस को कहा है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के बारे तो मोदी सरकार बात ही नहीं कर रही है। 2006 में जो सिफारिशें स्वामीनाथन आयोग ने दी थीं उसे 11 सितंबर 2007 को ही पिछली कांग्रेस सरकार ने स्वीकार किया था।

स्वामीनाथन कमेटी की मुख्य सिफारिशें, जिसकी चर्चा हर किसान आंदोलन के समय होती है….

स्वामीनाथन कमेटी ने जो सबसे प्रमुख सिफारिश की वो यह थी कि कृषि को राज्यों की सूची के बजाय समवर्ती सूची में लाया जाए। ताकि केंद्र व राज्य दोनों किसानों की मदद के लिए आगे आएं और समन्वय बनाया जा सके।

कमेटी ने बीज और फसल की कीमत को लेकर भी सुझाव दिया। कमेटी ने कहा कि किसानों को अच्छी क्वालिटी का बीज कम से कम दाम पर मुहैया कराया जाए और उन्हें फसल की लागत का पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम मिले।

स्वामीनाथन कमेटी ने कहा कहा कि अच्छी उपज के लिए किसानों के पास नई जानकारी का होना भी जरूरी है। ऐसे में देश के सभी गांवों में किसानों की मदद और जागरूकता के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल की स्थापना की जाए। इसके अलावा महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड की व्यवस्था की जाए।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में भूमि सुधारों पर भी जोर दिया और कहा कि अतिरिक्त व बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांट दिया जाए। इसके अलावा कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए गैर-कृषि कार्यों को लेकर मुख्य कृषि भूमि और वनों का डायवर्जन न किया जाए। कमेटी ने नेशनल लैंड यूज एडवाइजरी सर्विस का गठन करने को भी कहा।

आंदोलन करने वाले किसान सामाजिक सुरक्षा की भी मांग कर रहे हैं। आपको बता दें कि स्वामीनाथन कमेटी ने भी किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाने की सिफारिश की थी, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके।

कमेटी ने छोटे-मंझोले किसानों को लेकर भी बड़ी सिफारिश की थी और कहा था कि सरकार खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था करे, ताकि गरीब और जरूरतमंद किसानों को कोई दिक्कत न हो।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ सिफारिश की थी कि किसानों के कर्ज की ब्याज दर 4 प्रतिशत तक लाई जाए और अगर वे कर्ज नहीं दे पा रहे हैं तो इसकी वसूली पर रोक लगे

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