Wednesday, May 29, 2024
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लखनऊ लोकसभा हमेशा से रहा है हॉट सीट

उत्तर प्रदेश की राजधानी, (Lucknow)लखनऊ लोकसभा का इतिहास

Lucknow लोकसभा सीट का इतिहास रोचक है। प्रदेश के केंद्र में स्थित यह लोकसभा सीट अपने आप में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूबे की राजधानी भी है यहां का राजनीतिक इतिहास बहुत दिलचस्प रहा है सन् 1967 में एक निर्दलीय उम्मीदवार ने यहां से जीत दर्ज की थी। सबसे ज्यादा बार जीतने का रिकॉर्ड अटल बिहारी बाजपेयी के नाम है।

प्रदेश में भले ही शासन करने वाले राजनैतिक दल बदलते रहे हों, पर लोकसभा चुनाव में राजधानी में कांग्रेस और भाजपा का वर्चस्व रहा है।

जब लखनऊ सीट से जीते निर्दलीय उम्मीदवार मुल्ला

संसदीय सीट पर वर्ष 1967 में निर्दलीय प्रत्याशी की जीत का डंका बजा। उस समय आनंद नारायण मुल्ला ने कांग्रेस के वीआर मोहन को आसानी से मात दी थी।

आनंद नारायण मुल्ला कश्मीरी ब्राह्मण थे। उनके पिता जगत नारायण मुल्ला मशहूर सरकारी वकील थे। आनंद नारायण वकालत करने के साथ ही उर्दू के कवि भी थे। उनकी रचनाओं पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 1967 में जब लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तो उन्होंने भी पर्चा दाखिल किया। देश में उस समय कांग्रेस की लहर चल रही थी। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। इसी के बूते वे चुनाव में खड़े हो गए। चुनाव में कांग्रेस से उनके मुकाबले वेद रत्न मोहन मैदान में उतरे। वेद रत्न मोहन लखनऊ के पूर्व मेयर रह चुके थे तथा साधन-संपन्नता में भी कोई कमी नहीं थी।

जनसंघ प्रत्याशी आर सी शर्मा तीसरे स्थान पर

सन 1967के ही लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ से आरसी शर्मा को टिकट मिला था। रिजल्ट की घोषणा हुई तो पहले स्थान पर आनंद नारायण मुल्ला रहे और उन्हें 92,535 वोट मिले। दूसरे नंबर पर वेद रत्न मोहन थे, और उनके खाते में 71,563 वोट आए। वहीं आरसी शर्मा को 60,291 वोट मिले और वे तीसरे नंबर पर रहे।

किंतु आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा है की बीते 33 सालों से इस लोकसभा सीट पर भाजपा को कोई भी मात नहीं दे पाया है !

जगदीश गांधी भी थे मैदान में

सन 1967 के इस चुनाव में एक अन्य निर्दलीय प्रत्याशी का नाम भी चर्चा में था। सिटी मांटेसरी स्कूल के संस्थापक जगदीश गांधी ने भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में उन्हें 9449 मत मिले। अलीगढ़ से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधानसभा चुनाव जीत चुके जगदीश गांधी ने इससे पहले वर्ष 1962 का लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था। हालांकि उस बार भी उनको हार झेलनी पड़ी। चुनाव में 14774 वोट के साथ वे तीसरे नंबर पर रहे।

कब किसके सिर सजा लखनऊ का ताज

सन् 1951 में कांग्रेस के विजय लक्ष्मी पंडित ,1957 में कांग्रेस के पुलिन बिहारी बनर्जी और तीसरी बार फिर से एक बार कांग्रेस के ही बीके धवन 1962 मे यहाँ से सांसद चुने गए उसके बाद 1967 में निर्दलीय प्रत्याशी आनंद नारायण मुल्ला इस रवायत को बदला लेकिन अगले चुनाव में ही कांग्रेस ने अपना खोया लखनऊ 1971 में शीला कौल को टिकट देकर वापस पाया, 1977 में भारतीय लोक दल के हेमवती नंदन बहुगुणा को लखनऊ की जनता ने जीत दिला कर संसद भेजा, 1980- 84 के चुनाव में कांग्रेस की शीला कौल ने फिर से लखनऊ का चुनाव जीता, 1989 में परिवर्तन की बयार में जनता दल के मांधाता सिंह ने जीत दर्ज की फिर इस सीट पर देश के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी वाजपेयी निरंतर पांच बार लखनऊ लोकसभा से विजय श्री हासिल करने वाले वाहिद उम्मीदवार रहे हैं इतना ही नहीं अटल बिहारी वाजपेयी जब भी प्रधानमंत्री रहे हैं तब वह लखनऊ से ही चुनकर लोकसभा पहुंचते थे और सन 1991के राम लहर में यह सिलसिला शुरू हुआ और सन 2004 में भी वाजपेयी ने विजयश्री हासिल कर लखनऊ का प्रतिनिधित्व किया उसके बाद सन 2009 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव न लड़ने की वजह से उनके स्थान पर लालजी टंडन ने नामांकन किया और जीत दर्ज की2014 और 19 के चुनाव में भाजपा के वरिष्ठ नेता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यहां से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की!

सियासी रुझान

सूबे की राजधानी लखनऊ की लोकसभा सीट की स्थिति बीते 33 वर्षों से यहां पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है सन् 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी ने इस रवायत का आगाज किया था जो अभी तक अनवरत है देश के गृहमंत्री रहे और अब रक्षा मंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह यहां से वर्तमान सांसद हैं और भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की सूची में लखनऊ से उनको उम्मीदवार भी बनाया है ऐसे में जहां इस सीट से राजनाथ सिंह चुनाव लड़ रहे हैं तो वहीं इंडिया गठबंधन की ओर से इसी लोकसभा के अंतर्गत आने वाली एक विधानसभा सीट के विधायक रविदास मेहरोत्रा इंडिया गठबंधन की उम्मीदवार हैं और बीएसपी ने भी मुस्लिम कैंडिडेट देकर सभी को चौंका दिया है सियासी जानकार बताते हैं कि इस सीट से वर्तमान सांसद को टक्कर दे पाना इंडिया गठबंधन के लिए दूर की कौड़ी साबित हो सकती है ।

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